अल्लाह के बताए हुए रास्तों पर चलोगे
◆इस दुआ में اللّٰہُمَّ और رَبَّنَاۤ दोनों अल्फ़ाज़ आये हैं। यानी
“ऐ अल्लाह!” और “ऐ हमारे रब” दोनों सेगों का इस्तेमाल हुआ है। इससे साफ मालूम होता है कि हजरत ईसा अलै. न तो खुद अल्लाह(खुदा/ईश्वर) थे न अल्लाह के बेटे और न ही रिज्क या किसी दूसरी चीज का इख्तियार रखने वाले थे।
◆ न ही उनके साथियों का ये अकीदा था कि ईसा अलै. खुद से रिज्क देने वाले हैं वरना न वो ईसा अलै. से रिज्क के लिए दुआ करवाते और न ईसा अलै. दुआ करते बल्कि खुद उनके हुक्म से दस्तरख़्वान नाजिल हो जाता।
◆एक मुसलमान के लिए सोचने का मुकाम है कि जब ईसा अलै. जैसा बड़े मर्तबे वाला रसूल भी अल्लाह से अपनी हाजत के लिए दुआ करता है तो अल्लाह को छोड़कर दूसरी हस्तियों को मुश्किल कुशा और हाजत रवा ठहराना कितना सही है???
📌 दुआ – 14
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🔷हजरत आदम और मां हव्वा अलै. की तौबा:
🔶 رَبَّنَا ظَلَمۡنَاۤ اَنۡفُسَنَا وَ اِنۡ لَّمۡ تَغۡفِرۡ لَنَا وَ تَرۡحَمۡنَا لَنَکُوۡنَنَّ مِنَ الۡخٰسِرِیۡنَ ﴿۲۳﴾
🔷ऐ हमारे रब! हमने अपने ऊपर ज़ुल्म किया। अब अगर आपने हमें माफ़ नहीं किया और हम पर रहम नहीं किया तो यक़ीनी तौर पर हम नुकसान उठाने वालों में से हो जाएँगे।
📖 सूरह मायदा 7:23
📑 अहम बातें:
◆ ये दुआ उस वाकिये पर मांगी गई जब हजरत आदम और मां हव्वा अलै. ने शैतान के बहकावे में आ कर अल्लाह के हुक्म के खिलाफ एक खास पेड़ का फल खाया तो उनके सतर [गुप्तांग] एक-दूसरे के सामने खुल गए और वे अपने जिस्मों को जन्नत के पत्तों से ढाँकने लगे। अपने इस अमल पर वो बहुत शर्मिंदा हुए तो अल्लाह ने उन्हें तौबा के ये अल्फ़ाज़ सिखाये।
🔷इस किस्से से हमें कई सबक मिलते हैं:
●इन्सान के अन्दर शर्म व हया का जज़्बा एक फ़ितरी जज़्बा है।
●शैतान की पहली चाल जो उसने इन्सान को इन्सानी फ़ितरत की सीधी राह से हटाने के लिये चली, ये थी कि उसकी शर्म व हया के इस जज़्बे पर चोट लगाए और नंगेपन के रास्ते से उसके लिये बेशर्मी के दरवाज़े खोले और उसको जिंसी मामलों (यौन सम्बन्धों) में गुमराह कर दे।
●ये भी इन्सान की ऐन फ़ितरत है कि वो बुराई की खुली दावत को कम ही क़बूल करता है आम तौर से उसे जाल में फाँसने के लिये बुराई की तरफ़ हर बुलानेवाले को ख़ैरख़ाह के भेस ही में आना पड़ता है।
●आम तौर से ये जो मशहूर हो गया है कि शैतान ने पहले हज़रत हव्वा को अपने जाल में फाँसा और फिर उन्हें हज़रत आदम (अलै.) को फाँसने के लिये ज़रिआ बनाया, क़ुरआन इस बात को रद्द करता है। उसका बयान ये है कि शैतान ने दोनों को धोखा दिया और दोनों उससे धोखा खा गए।
●इन्सान अपने अख़लाक़ी मर्तबे में एक अफ़ज़ल मख़लूक़ है। यही वजह है कि जब शैतान को ख़बरदार किया गया तो वो अपने क़ुसूर को मानने और बन्दगी की तरफ़ पलट आने के बजाए नाफ़रमानी पर और ज़्यादा जम गया, और जब इन्सान को उसके क़ुसूर पर ख़बरदार किया गया तो उसने शैतान की तरह सरकशी नहीं की बल्कि अपनी ग़लती का एहसास होते ही वो शर्मिन्दा हुआ, अपनी ग़लती मानकर बग़ावत से फ़रमाँबरदारी की तरफ़ पलट आया और माफ़ी माँगकर अपने रब की रहमत की गोद में पनाह ढूँढने लगा।
●इस किस्से के बारे में एक हदीस मशहूर है कि इस मौके पर हजरत आदम अलै. ने आखिरी नबी सल्ल. के वसीले से दुआ की। क़ुरआन की ये आयत और सूरह अल बक़रह आयत 37 से ये बात साफ हो जाती है कि अल्लाह ने जो दुआ तौबा के लिए सिखाई उसमें किसी वसीले का ज़िक्र नहीं। साथ ही मुस्तदरक अल-हाकिम हदीस 4228 जिसमें ये जिक्र मिलता है कि आदम अलै. ने नबी सल्ल. का वसीला मांगा, इस रिवायत पर मुहद्दिसीन ने जिरह की है और इसे मौजूअ(मनघड़ंत) करार दिया है।
📌 दुआ – 15
🔷जालिमों के साथ अंजाम होने से बचने की दुआ:
🔸 رَبَّنَا لَا تَجۡعَلۡنَا مَعَ الۡقَوۡمِ الظّٰلِمِیۡنَ ﴿۴۷﴾
🔹ऐ हमारे रब ! हमें ज़ालिम(अत्याचारी) लोगों में शामिल न करना।
📖 सूरह आराफ 7:47
📑 अहम बातें:
◆ये दुआ “असहाबुल आराफ” की दुआ है जो वो कयामत के दिन करेंगे। जब उनके चेहरे जहन्नम की तरफ फेरे जायेंगे। इस दुआ के मायने ये भी हैं:-
“ऐ अल्लाह हमें उन जहन्नमीयों में शामिल न कर जो जालिम लोग है।”
💠 नोट:- असहाबुल-आराफ़ (आराफ़वाले) वे लोग होंगे जिन्होंने ज़िन्दगी के न तो नेक अमल ही इतने ज्यादा होंगे कि जन्नत में दाख़िल हो सकें और न बुरे अमल ही इतने ज्यादा होंगे कि दोज़ख़ में झोंक दिये जाएँ। इसलिये वे जन्नत और दोज़ख़ के बीच एक सरहद पर रहेंगे।
📌 दुआ – 16
🔹शुऐब अलै. की दुआ:
🔸 رَبَّنَا افۡتَحۡ بَیۡنَنَا وَ بَیۡنَ قَوۡمِنَا بِالۡحَقِّ وَ اَنۡتَ خَیۡرُ الۡفٰتِحِیۡنَ ﴿۸۹﴾
🔹 ऐ हमारे परवरदिगार ! हमारे और हमारी क़ौम के बीच ठीक-ठीक फ़ैसला कर दे और तू सबसे अच्छा फ़ैसला करनेवाला है।”
📖 सूरह आराफ 7:89
📑 अहम बातें:
◆जब शुऐब अलै. की कौम ने हक़(खुदा का भेजा हुआ पैगाम) मानने से इनकार किया तो उन्होंने ये दुआ मांगी।
◆हकीकत में शुऐब अलै. ने अपनी कौम में मौजूद हक़ के इंकरियों(काफिरों) की तबाही की दुआ मांगी।
अल्लाह ने उनकी ये दुआ क़बूल की और एक भयानक भूकम्प के जरिये उस क़ौम को हलाक कर दिया।
📌 दुआ – 17
✨ मरते दम तक इस्लाम पर जमे रहने के लिए दुआ :
🔸 رَبَّنَاۤ اَفۡرِغۡ عَلَیۡنَا صَبۡرًا وَّ تَوَفَّنَا مُسۡلِمِیۡنَ ﴿۱۲۶﴾
🔹 ऐ हमारे परवरदिगार ! हमपर सब्र की बारिश बरसा और हमें दुनिया से उठा तो इस हाल में कि हम तेरे फ़रमाँबरदार(मुस्लिम) हों।
📖 सूरह आराफ 7:126
📑 अहम बातें:
◆इस दुआ में ये पैगाम मौजूद है कि अगर अल्लाह तआला की मर्जी और उसका हुक्म न हो, तो इन्सान की हर उम्मीद और उसका हर अमल बे मायने है।
इसीलिए ईमान पर साबित कदमी और जमे रहने के लिए अल्लाह ने ये दुआ सिखाई।
◆असल में ये दुआ उन जादूगरों की है जिन्होंने हजरत मूसा अलै. पर ईमान लाने का ऐलान कर दिया था। फ़िरऔन के बुलावे पर ये जादूगर आये तो थे हजरत मूसा अलै. से मुकाबला करने लेकिन जब इन्होंने हजरत मूसा अलै. को मोजज़ा(चमत्कार) देखा तो समझ गए ये जादू नहीं बल्कि सच्चे खुदा के सच्चे नबी का मोजज़ा है। उनके ईमान लाने पर जब फ़िरऔन ने उन्हें मारने की धमकी दी तो उन्होंने अपने रब से ये दुआ की।
◆इस मक़ाम पर ये बात भी देखने के क़ाबिल है कि चन्द लम्हों के अन्दर ईमान ने उन जादूगरों के किरदार में कितना बड़ा इंक़िलाब पैदा कर दिया। अभी थोड़ी देर पहले इन्हीं जादूगरों के घटियापन और पस्ती का ये हाल था कि अपने बाप-दादा के धर्म की मदद व हिमायत के लिये घरों से चलकर आए थे और फ़िरऔन से पूछ रहे थे कि अगर हमने अपने मज़हब को मूसा के हमले से बचा लिया तो सरकार से हमें इनाम तो मिलेगा ना? या अब जो ईमान की नेमत नसीब हुई तो उन्हीं की हक़-परस्ती और बुलन्द-हिम्मती इस हद को पहुँच गई कि थोड़ी देर पहले जिस बादशाह के आगे लालच के मारे बिछे जा रहे थे अब उसकी बड़ाई, ताक़त और जाहो-जलाल को ठोकर मार रहे हैं और उन बुरी-से-बुरी सज़ाओं को भुगतने के लिये तैयार हैं जिनकी धमकी वो दे रहा है, मगर उस हक़ को छोड़ने को तैयार नहीं हैं जिसकी सच्चाई उनपर खुल चुकी है।
📕तफ़हीमुल क़ुरआन
📌 दुआ – 18
🔷दुश्मन कौम से निजात के लिए दुआ:
🔸 رَبَّنَا لَا تَجۡعَلۡنَا فِتۡنَۃً لِّلۡقَوۡمِ الظّٰلِمِیۡنَ ﴿ۙ۸۵﴾ وَ نَجِّنَا بِرَحۡمَتِکَ مِنَ الۡقَوۡمِ الۡکٰفِرِیۡنَ ﴿۸۶﴾
🔹ऐ हमारे रब ! हमें ज़ालिम लोगों के जरिये आजमाइश में न डाल। और अपनी रहमत से हमें काफ़िरों [हक़ का इनकार करनेवालों] से निजात अता फरमा।
📖 सूरह यूनुस 10:85-86
📑 अहम बातें:
◆जब हर तरफ़ गुमराही का ग़लबा और बोलबाला होता है और इस हालत में जब कुछ लोग हक़(सत्य) को क़ायम करने के लिये उठते हैं, तो उन्हें तरह-तरह के ज़ालिमों (अत्याचारियों) से वास्ता पेश आता है।
●एक तरफ़ बातिल (असत्य) के असली अलमबरदार (झंडावाहक) होते हैं जो पूरी ताक़त से इन हक़ की दावत देनेवालों को कुचल देना चाहते हैं।
●दूसरी तरफ़ सिर्फ़ नाम के हक़परस्तों का एक अच्छा-ख़ासा गिरोह होता है जो हक़ को मानने का दावा तो करता है मगर बातिल (असत्य) के अत्याचारी शासन के मुक़ाबले में हक़ को क़ायम करने की कोशिश को ग़ैर-ज़रूरी, बेकार या बेवक़ूफ़ी समझता है और उसकी पूरी कोशिश ये होती है कि अपनी इस ख़ियानत (बेईमानी) को जो वो हक़ के साथ कर रहा है किसी-न-किसी तरह दुरुस्त साबित कर दे और उन लोगों को उलटा ग़लत साबित करके अपने दिल की गहराइयों में खुले तौर पर या छिपे तौर पर पैदा होती है।
●तीसरी तरफ़ आम लोग होते हैं जो अलग खड़े तमाशा देख रहे होते हैं और उनका वोट आख़िरकार उसी ताक़त के हक़ में पड़ा करता है जिसका पलड़ा भारी रहे, चाहे वो ताक़त सही हो या ग़लत।
★इस सूरतेहाल में हक़ की तरफ़ बुलानेवाले इन लोगों की हर नाकामी, हर मुसीबत, हर ग़लती, हर कमज़ोरी और ख़राबी इन सभी गिरोहों के लिये अलग अलग तरीके से फ़ितना(आजमाइश) बन जाती है।
●वे कुचल डाले जाएँ या हार जाएँ तो पहला गरोह कहता है कि देख लिया! हम न कहते थे कि ऐसी बड़ी-बड़ी ताक़तों से टकराने का नतीजा कुछ क़ीमती जानों के सिवा कुछ न होगा, और आख़िरकार इस तबाही में अपने-आपको डालने का शरीअत ने हमें पाबन्द ही कब किया था, दीन की कम-से-कम ज़रूरी माँगें तो उन अक़ीदों व आमाल से पूरी हो ही रही थीं जिसकी इजाज़त वक़्त के फ़िरऔनों ने दे रखी थी। तीसरा गरोह फ़ैसला कर देता है कि हक़ वही है जो ग़ालिब रहा।
◆इसी तरह अगर वे अपनी दावत के काम में कोई ग़लती कर जाएँ, या उनसे, बल्कि उनके किसी एक आदमी से भी अख़लाक़ी एतिबार से कोई ग़लती हो जाए, तो बहुत-से लोगों के लिये बातिल (असत्य) से चिमटे रहने के हज़ार बहाने निकल आते हैं और फिर उस दावत की नाकामी के बाद लम्बे समय तक किसी दूसरी दावत के उठने की उम्मीद बाक़ी नहीं रहती। तो ये अपने अन्दर बहुत-से मानी और मतलब रखनेवाली दुआ थी जो मूसा (अलैहि०) के उन साथियों ने माँगी थी कि:
“ऐ ख़ुदा, हमपर ऐसी मेहरबानी कर कि हम ज़ालिमों के लिये फ़ितना(आजमाइश) बनकर न रह जाएँ। यानी हमको ग़लतियों से, ख़राबियों से, कमज़ोरियों से बचा और हमारी कोशिश को दुनिया में कामयाब कर दे, ताकि हमारा वुजूद तेरे बन्दों के लिये भलाई का ज़रिआ बने, न कि ज़ालिमों के लिये बुराई का ज़रिआ।”
📌 दुआ – 19
🔷 अपनों से अलग होते वक़्त इब्राहीम अलै. की दुआ:
🔶 رَبَّنَاۤ اِنَّکَ تَعۡلَمُ مَا نُخۡفِیۡ وَ مَا نُعۡلِنُ ؕ وَ مَا یَخۡفٰی عَلَی اللّٰہِ مِنۡ شَیۡءٍ فِی الۡاَرۡضِ وَ لَا فِی السَّمَآءِ ﴿۳۸﴾
🔷परवरदिगार! आप जानते है जो कुछ हम छिपाते हैं और जो कुछ ज़ाहिर करते हैं। और वाक़ई अल्लाह से कुछ भी छिपा हुआ नहीं है, न ज़मीन में, न आसमानों में।
📖 सूरह इब्राहीम 14:38
📑 अहम बातें:
इब्राहीम अलै. ने ये दुआ अपनी बीवी और छोटे से बेटे इस्माईल अलै. को वीरान वादी मक्का में अकेला छोड़ने के बाद की।
इब्राहीम अलै. ने एक तरफ तो अल्लाह पर पूरा भरोसा करके अपनी बीवी और छोटे से बेटे को मक्का में ला बसाया और दुआ भी कर ली कि अल्लाह लोगों के दिल इनकी तरफ माइल कर देना और इन्हें फलों का रिज़्क़ अता फरमाना और दूसरी तरफ उनके दिल में एक शौहर और वालिद होने के नाते जो फ़िक़्र थी उसे भी उन्होंने इस दुआ के ज़रिये अल्लाह के सामने रख दिया।
बन्दा अपने रब से जब किसी अहम मामले में दुआ करता है तो उसे एक बड़ी मुश्किल ये पेश आती है कि दुआ के दौरान कुछ बातें वो कहना तो चाहता है लेकिन वो बयान में नहीं आ पाती और कभी कभी ऐसा भी होता है कि कुछ वजह से इंसान कोई बात अल्लाह से कहने में झिझक महसूस करता है तो इस दुआ ने उस तरफ की सारी बातों को समेट लिया है क्योंकि अल्लाह तो ज़बान से कही जाने वाली बात को भी जानते है और दिल में छुपी हुई बात को भी जानते है।
📌 दुआ – 20
🔷अपने और अपनी औलाद के लिए इबादत में इस्तेक़ामत तलब करने की दुआ :
🔶رَبِّ ٱجۡعَلۡنِى مُقِيمَ ٱلصَّلَوٰةِ وَمِن ذُرِّيَّتِىۚ رَبَّنَا وَ تَقَبَّلۡ دُعَآءِ ﴿۴۰﴾
🔷या रब! मुझे भी नमाज़ कायम करने वाला बना दीजिये और मेरी औलाद में से भी (ऐसे लोग पैदा फरमाइये जो नमाज़ कायम करें।) परवरदिगार! मेरी दुआ क़बूल कीजिए।
📖 सूरह इब्राहीम 14:40
📑 अहम बातें:
● इब्राहीम अलै. ने सिर्फ खुद के लिए ही नहीं बल्कि अपनी औलाद के लिए भी नमाज़ कायम करने की दुआ की, हमें भी अपने साथ अपनी औलाद की आख़िरत की फ़िक़्र करनी चाहिए और उनकी इस तरह तरबियत करनी चाहिए कि वो हमेशा अल्लाह के बताए हुए नेक काम खुश-दिली से करते रहे।
📌 दुआ – 21
🔷 अपने और अपने वालिदैन और तमाम ईमान वालों के लिए मगफिरत माँगने की दुआ :
🔶رَبَّنَا اغۡفِرۡ لِیۡ وَ لِوَالِدَیَّ وَ لِلۡمُؤۡمِنِیۡنَ یَوۡمَ یَقُوۡمُ الۡحِسَابُ ﴿۴۱﴾
🔷ऐ हमारे परवरदिगार! मुझे और मेरे माँ-बाप को और सब ईमान लानेवालों को उस दिन माफ़ कर देना, जिस दिन हिसाब क़ायम होगा।
📖 सूरह इब्राहीम 14:41
📑 अहम बातें:
◆खाना-ए-काबा की तामीर करके इब्राहीम अलै. ने अपने और अपनी आने वाली औलाद के लिए नमाज़ कायम करने की दुआ माँगने के फौरन बाद अल्लाह से अपनी, अपने वालिदैन और तमाम मोमिनीन की मगफिरत तलब की।
◆ अल्लाह का हुक्म पूरा करने के फौरन बाद अपने लिए, अपने रिश्तेदारों और तमाम ईमान वाले इंसानों की मगफिरत की दुआ करनी चाहिए।
◆यह नबियों की सीरत की खासियत है कि वो तमाम ईमान वालों की फिक्र करते हैं, यही वजह है कि हमें भी कौम, नस्ल, रंग, जबान और सरहदों से आगे बढ़कर पूरी दुनिया के मुसलमानों की फिक्र करनी चाहिये।
📌 दुआ – 22
🔷 असहाबुल कहफ़ की दुआ:
🔶رَبَّنَاۤ اٰتِنَا مِنۡ لَّدُنۡکَ رَحۡمَۃً وَّ ہَیِّیٔۡ لَنَا مِنۡ اَمۡرِنَا رَشَدًا ﴿۱۰﴾
🔷ऐ हमारे रब! हम पर ख़ास अपने पास से रहमत नाज़िल फरमाइये और हमारे मामले में हमारे लिए भलाई का रास्ता मुहैया फरमा दीजिये।
📖 सूरह अल-कहफ़ 18:10
📑 अहम बातें:
● ये असहाबुल-कहफ़ की दुआ है जो कुछ नौजवानों का गिरोह था, उन्होनें ये दुआ वक़्त के जालिम बादशाह से बचने के लिए कहफ़ (गुफा) में पनाह लेते वक्त पढ़ी थी, वो जालिम बादशाह चाहता था कि जिस तरह से वो खुद और उसकी प्रजा के सभी लोग शिर्क कर रहे है, ये नौजवान भी एक रब का इनकार कर दें और शिर्क करने लगें लेकिन उन नौजवानों का ईमान अल्लाह पर बहुत मजबूत था। उन्होंने अपने आसपास मौजूद तमाम लोगों की और वक़्त के बादशाह तक से दुश्मनी मोल ले ली, लेकिन शिर्क करने को तैयार ना हुए। बादशाह और तमाम लोगों के जुल्म से बचने के लिए उन्होंने गुफा में पनाह ली और अल्लाह से ये दुआ की। अल्लाह ने उनके ईमान और इख्लास को देखते हुए उनकी तमाम ज़ालिमों से हिफाज़त फरमाई।
● जो लोग अल्लाह के लिए ईमान और इख्लास के साथ झूठे और ज़ालिम लोगों से अल्हेदगी(दूरी) इख्तियार करते है, फिर अल्लाह से उसकी ख़ास रहमत का सवाल करते है, तो अल्लाह ऐसे लोगों पर अपनी ख़ास रहमत नाज़िल करके उनकी मदद ज़रूर फरमाते है।
● ख़ासतौर से नौजवान जब अल्लाह की तरफ पलटते है तो अल्लाह मौज़ज़े (चमत्कार) करके उनकी हिफाज़त करते है।
📌 दुआ – 23
🔷 जालिम बादशाह से सामना होने पर दुआ:
🔶رَبَّنَاۤ اِنَّنَا نَخَافُ اَنۡ یَّفۡرُطَ عَلَیۡنَاۤ اَوۡ اَنۡ یَّطۡغٰی ﴿۴۵﴾
🔷ऐ हमारे रब! हमें अंदेशा है कि वो(फ़िरऔन) हम पर कोई ज़्यादती करेगा या उसकी सरकशी और बढ़ जायेगी।
📖 सूरह ताहा 20:45
📑 अहम बातें:
●जब अल्लाह ने मूसा अलै. और हारून अलै. को फ़िरऔन तक हक़ की दावत पहुँचा देने का काम दिया तो अपने अंदेशे और घबराहट जाहिर करते हुए अल्लाह के दोनों नबीयों ने अल्लाह को इन अल्फाज़ो में पुकारा। दुआ सुनने के बाद अल्लाह ने दोनों की घबराहट दूर करने और हौसला पैदा करने के लिए जवाब दिया कि तुम दोनों मत डरो,” मैं तुम दोनों के साथ हूँ, सब कुछ सुनता और देखता हूँ”। और जिनके साथ वो रब हो जो कि हर चीज का इल्म रखता है और हर चीज पर कुदरत रखता है तो भला उनका कोई क्या बिगाड़ सकता है?
● अल्लाह हर इंसान को उसकी ताकत के मुताबिक ही ज़िम्मेदारी और काम देते है। क़ुरआन और सहीह हदीस के ज़रिए जो ज़िम्मेदारी और काम हमें दिए गए है, उन्हें अच्छे से समझ लेने के बाद हमें अपनी पूरी ताकत और हौसले से उनको पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। जब कमज़ोरी और कम-हिम्मती महसूस होने लगे तो अल्लाह के सामने अपना हाल रख देना चाहिए, यक़ीनन अल्लाह अपने बन्दों की पुकार सुनते है। जिस तरह से अल्लाह ने पिछले लोगों के लिए आसानी की है वो हमारे लिए भी आसानियां ज़रूर कर देंगे।
📌 दुआ – 24
🔷 अल्लाह के खास बन्दों की दुआ, जिन्हें आग के अजाब से बचा लिया गया :
🔶رَبَّنَاۤ اٰمَنَّا فَاغۡفِرۡ لَنَا وَ ارۡحَمۡنَا وَ اَنۡتَ خَیۡرُ الرّٰحِمِیۡنَ ﴿۱۰۹﴾ۚۖ
🔷ऐ हमारे रब! हम ईमान ले आये है तो हमें माफ़ कर दीजिए और हम पर रहम फरमाइये और आप सब से बढ़ कर रहम फरमाने वाले है।
📖 सूरह अल-मूमिनून 23:109
📑 अहम बातें:
● जहन्नम में अज़ाब झेल रहे मुजरिम जब अज़ाब की सख्ती से परेशान होकर अल्लाह को पुकार कर कहेंगे कि अल्लाह हम को यहाँ से एक बार निकाल दें हम दोबारा ऐसा नहीं करेंगे तो उन्हें ज़वाब मिलेगा दफा हो जाओ, इसी में पड़े रहो और मुझसे बात ना करो। मेरे बन्दों का एक गिरोह (समूह) जो मुझ से दुआ करता था तुम उनका मज़ाक उड़ाने में इतने मगन थे कि मुझ से ही गाफिल हो गए और उनके ईमान और सब्र का सिला हमनें उन्हें ये दिया है कि वो कामयाब है और तुम तुम्हारे इनकार की वजह से नाकामयाब हो।
●ईमान वालों की बातों को तवज्जों से सुनना चाहिए और किसी भी ईमान वालें का कभी मज़ाक नहीं बनाना चाहिए। उससे कोई इल्मी या अमली गलती हो भी जाए तो बहुत अच्छे तरीके से उनकी इस्लाह करने की कोशिश करनी चाहिए।
● इंसानों का मज़ाक बनाना अल्लाह के नज़दीक नापसन्दीदा अमल है और ईमान वालें इंसान का मज़ाक उड़ाने की बात हो तो अल्लाह का अज़ाब ऐसे लोगों को अपनी गिरफ्त में ले लेता है।
📌 दुआ – 25
🔷 रातों में नमाज़ क़ायम करते वक़्त रहमान के बन्दों की दुआ::
🔶 رَبَّنَا اصۡرِفۡ عَنَّا عَذَابَ جَہَنَّمَ ٭ۖ اِنَّ عَذَابَہَا کَانَ غَرَامًا ﴿۶۵﴾
اِنَّہَا سَآءَتۡ مُسۡتَقَرًّا وَّ مُقَامًا ﴿۶۶﴾
🔷 हमारे परवरदिगार! जहन्नम के अज़ाब को हमसे दूर रखिये, हक़ीक़त ये है कि इसका अज़ाब वो तबाही है जो चिमट कर रह जाती है।
वो (जहन्नम) तो बड़ा ही बुरा ठिकाना और मक़ाम है।
📖 सूरह अल-फुरक़ान 25:65-66
📑 अहम बातें:
◆ये इबादुर-रहमान (रहमान के बन्दों) की दुआ है।
◆अल्लाह के बन्दे जो जानते है कि अल्लाह रहमान है यानी बहुत ज़्यादा प्यार करने वाले, ख़्याल रखने वाले और मेहरबानी करने वाले है, जब वो अल्लाह के सामने रातों को खड़े होते है और सज्दे करते है तो जहन्नम के अज़ाब से पनाह की दुआ करते जाते है।
●इस दुआ से ये बात भी पता चली कि अल्लाह के मुख्लिस और ख़ास बन्दे कभी-भी जहन्नम के अज़ाब से बेफिक्र नहीं होते, हमेशा डरते रहते है और नेक अमल करने के बावजूद भी उस सजा की जगह से बचने की दुआ करते रहते है।
●हमें भी अल्लाह के बन्दे बनने की कोशिश करनी चाहिए, अल्लाह के बन्दों के जो औसाफ़ क़ुरआन में बयान किये गए है खासतौर से सूरह अल-फुरक़ान आयात 63-76 में बताए गए है उन्हें समझ कर अपने अंदर पैदा करने चाहिए और जहन्नम के अज़ाब से कभी बेफ़िक्र और बेख़ौफ़ नहीं होना चाहिए क्योंकि अल्लाह ने खुद क़ुरआन में सूरह अल-मारिज़ की आयत 28 में फरमाया है कि:
“उनके रब का अज़ाब ऐसी चीज़ नहीं है जिससे कोई बेख़ौफ़ हो”।
तो अल्लाह हम सबको जहन्नम के अज़ाब से, क़यामत के दिन होने वाले अज़ाब से, क़ब्र के अज़ाब से और दुनिया की आज़माइशों से अपनी पनाह में रखें और हमें बिना हिसाब किताब के जन्नत में जाने वाले लोगों में शामिल करें।
📌 दुआ – 26
🔷 बीवी-बच्चों के लिए अल्लाह के खास बन्दों की दुआ::
🔶 رَبَّنَا ہَبۡ لَنَا مِنۡ اَزۡوَاجِنَا وَ ذُرِّیّٰتِنَا قُرَّۃَ اَعۡیُنٍ وَّ اجۡعَلۡنَا لِلۡمُتَّقِیۡنَ اِمَامًا ﴿۷۴﴾
🔷ऐ हमारे रब, हमें अपनी बीवियों और अपनी औलाद से आँखों की ठण्डक नसीब फरमा और हमको परहेज़गारों का इमाम बना।
📖 सूरह फुरक़ान 25:74
📑 अहम बातें:
◆ये इबादुर-रहमान (अल्लाह के खास बन्दों) की दुआ है जो वो अपने बीवी-बच्चों के हक़ में करते हैं।
◆ अल्लाह के सच्चे बन्दों की यही ख्वाहिश होती है कि उसके बीवी बच्चे पक्के ईमान, आला सीरत और नेक अमल करने वाले हों। क्योंकि एक मोमिन को अपने बीवी बच्चों के हुस्नो-जमाल और शानो-शौकत से सुकून से नहीं मिलता बल्कि उनके नेक किरदार और अल्लाह की बंदगी में तरक्की से आँखों की ठंडक हासिल होती है। उसके लिए इससे बढ़कर कोई चीज तकलीफदेह नहीं हो सकती कि जो दुनिया में उसको सबसे ज्यादा प्यारे हैं उन्हें दोजख का ईंधन बनने के लिए तैयार होता देखे। अल्लाह के बागी बन जाने की सूरत में तो बीवी का हुस्न और बच्चों की जवानी और सलाहियतें उसके लिए और भी ज्यादा दिल दुखाने का सबब होती है क्योंकि वह हर वक्त इस रंज में घुटता रहता है कि यह सब अपनी खूबियों के बावजूद अल्लाह के अजाब में गिरफ्तार होने वाले हैं।
◆एक बात और ध्यान में रहनी चाहिए कि जिस वक्त यह आयात नाजिल हो रही थी उस वक्त मुसलमानों में शायद ही कोई ऐसा घराना हो जहां उनके महबूब तरीन रिश्तेदार कुफ्र और जहिलियत में गिरफ्तार ना हो। कोई मर्द ईमान ले आया था तो उसकी बीवी काफिर थी कोई औरत ईमान ले आई तो उसका शौहर काफी था। कोई नौजवान ईमान ले आया तो उसके मां बाप भाई बहन सब कुफ्र के दलदल में फंसे थे। इस हालत में हर मुसलमान एक तरह की रूहानी तकलीफ का सामना कर रहा था और उनके दिल से जो दुआ निकलती थी उसी की बेहतरीन तर्जुमानी क़ुरआन की इस आयत में की गई है।
◆इस दुआ में आंखों की ठंडक की जो तस्वीर खींची गई है कि अपने प्यारों को कुफ्र और जहिलियत में डूबा देखकर आदमी को मानो इस तरह तकलीफ हो रही है जिस तरह उसे आशोबे चश्म (आँख आना/Conjunctivitis) जैसी बीमारी हो और हर पल मानो उसकी आँखों में सुईयां सी चुभ रही हो। इस दर्दनाक हालात का इलाज यही होगा कि उसके बीवी-बच्चे इस्लाम के सच्चे पैरोकार बन जाएं, जिससे उसकी आँखे न सिर्फ ठीक हो कर आम हालत में आ जायें बल्कि इससे बढ़कर उसे ठंडक महसूस हो।
◆ये दुआ ये भी पैगाम देती है कि अल्लाह के बन्दों की हालत यह नहीं होती कि उनके खानदान के लोग हर मजहब और हर पार्टी में शामिल रहते हैं और ये तस्सवुर रखते हैं कि,“चलो हर बैंक में हमारा कुछ ना कुछ सरमाया मौजूद है।” बल्कि उनका हाल ये होता है कि वो खुद अपने पूरे खानदान समेत अल्लाह के झंडे तले खड़े हो कर बातिल गिरोहों से मुक़ाबला करते हैं।
◆मुत्तकियों(परहेज़गारों) का इमाम बनने से मुराद यह है कि हम तक़वा, खुदातरसी और उसकी नाफरमानी से डरने वालों में सबसे आगे बढ़ जाए और भलाई और नेकी के कामों में सबसे पहले हमारा शुमार हो। हम अकेले खुद नेक न हो बल्कि नेक लोगों के पेशवा और उनके सरदार हो और हमारी बदौलत दुनिया भर में नेकी फैले।
★अल्लाह के रसूल सल्ल. का फरमान है:
हर शख्स हाकिम(जिम्मेदार) है जिससे उसकी रिआया(अधीन लोगों) के बारे में सवाल होगा। एक हाकिम(शासक) से उसकी रिआया(प्रजा) के बारे में सवाल होगा। मर्द अपने घर का हाकिम है और उससे उसकी रिआया(बीवी-बच्चों और खानदान) के बारे में सवाल होगा।…
📒 सहीह बुखारी 2558
🌟लिहाजा हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हम अपने साथ अपने घर-खानदान वालों की इस्लाह की कोशिशें करें।
📌 दुआ – 27
🔷ईमान वालों के लिए अल्लाह के अर्श को उठाने वाले फरिश्तों की दुआ:
🔶 رَبَّنَا وَسِعۡتَ کُلَّ شَیۡءٍ رَّحۡمَۃً وَّ عِلۡمًا فَاغۡفِرۡ لِلَّذِیۡنَ تَابُوۡا وَ اتَّبَعُوۡا سَبِیۡلَکَ وَ قِہِمۡ عَذَابَ الۡجَحِیۡمِ ﴿۷﴾
رَبَّنَا وَ اَدۡخِلۡہُمۡ جَنّٰتِ عَدۡنِ ۣ الَّتِیۡ وَعَدۡتَّہُمۡ وَ مَنۡ صَلَحَ مِنۡ اٰبَآئِہِمۡ وَ اَزۡوَاجِہِمۡ وَ ذُرِّیّٰتِہِمۡ ؕ اِنَّکَ اَنۡتَ الۡعَزِیۡزُ الۡحَکِیۡمُ ۙ﴿۸﴾
وَ قِہِمُ السَّیِّاٰتِ ؕ وَ مَنۡ تَقِ السَّیِّاٰتِ یَوۡمَئِذٍ فَقَدۡ رَحِمۡتَہٗ ؕ وَ ذٰلِکَ ہُوَ الۡفَوۡزُ الۡعَظِیۡمُ ﴿۹﴾
🔷ऐ हमारे रब! तू अपनी रहमत और अपने इल्म के साथ हर चीज़ पर छाया हुआ है, तो माफ़ कर दे और जहन्नम के अज़ाब से बचा ले उन लोगों को जिन्होंने तौबा की है और तेरा रास्ता अपना लिया है।
ऐ हमारे रब! और उन्हें दाखिल कर हमेशा रहनेवाली उन जन्नतों में जिनका तूने उनसे वादा किया है और उनके माँ-बाप और बीवियों और औलाद में से जो नेक हों (उन्हें भी बख़्श कर साथ में जन्नत में दाखिल कर) बेशक तू ग़ालिब(प्रभुत्वशाली) और हकीम (तत्वदर्शी) है।
और उन्हें बुरे आमाल के नतीजे से बचा। जिसको तूने क़ियामत के दिन बुराइयों (की सजा) से बचा दिया, उसपर तूने बड़ा रहम दिया। यही बड़ी कामयाबी है।
📖 सूरह ग़ाफ़िर 40:7-9
📑 अहम बातें:
◆अल्लाह के अर्श(सिंहासन) को उठाने वाले खास फरिश्ते ये दुआ ईमान वालों के लिए करते हैं।
◆इस दुआ से मालूम होता है कि अल्लाह के सबसे करीब रहने वाले फरिश्ते ईमान वालों से बेइंतहा मुहब्बत और हमदर्दी रखते हैं। और अल्लाह की तस्बीह(गुणगान) के साथ वो ईमान वालों की बख्शिश की दुआ करते हैं।
◆आयत 7 में ही जिक्र है कि ‘ये फरिश्ते अल्लाह पर ईमान रखते हैं’ उससे जाहिर है कि ये ईमान का ही रिश्ता है जिसने अर्श वाली मखलूक को फर्श वाली मखलूक का खैर ख्वाह बना दिया।
◆यहाँ ये बात भी गौर करने लायक है कि ईमान वालों की ये खास निशानी बताई है कि वो गुनाह हो जाने के बाद तौबा तो करते ही हैं, साथ ही अल्लाह के बताए हुए सीधे रास्ते पर आ जाते हैं। ईमान वालों का अमल ये नहीं होता कि सही बात पता चल जाने के बाद जबानी तौबा कर लें और फिर उनके कदम उसी पुराने जाहिलियत के रस्ते पर चल पढ़ें।
◆ये फरिश्ते न सिर्फ नेक लोगों बल्कि उनके घर परिवार के लोगों के लिए भी दुआ करते हैं। जाहिर है एक आदमी की दिली तमन्ना होती है कि जिस भी बेहतर जगह वो रहे उसका परिवार भी उसके साथ हो, इसलिये ये फरिश्ते दुआ करते है कि ये सब मुसलमान परिवार के लोग एक साथ जन्नत में रहें। अगर एक शख्स जन्नत के ऊंचे दर्जे में हो और उसके मां-बाप और बीवी-बच्चे जन्नत के कमतर दर्जे में हो तो अल्लाह उस शख्श को नीचे दर्जे में लाने के बाजए उन सबको ऊँचे दर्जे में लाकर मिला देगा।
क़ुरआन में ही इसका जिक्र सूरह तूर 52:21 में इस तरह आया है:
🔷जो लोग ईमान लाये और उनकी औलाद ने भी ईमान के साथ उनकी पैरवी की तो हम उनकी औलाद को भी उनके दर्जे तक पहुंचा देंगे और उनके और उनके अमल में कुछ भी कमी न करेंगे।
📌 दुआ – 28
🔷 जन्नत में जाने वाले अहले ईमान के शुक्र के अल्फ़ाज़::
🔶 اَلۡحَمۡدُ لِلّٰہِ الَّذِیۡۤ اَذۡہَبَ عَنَّا الۡحَزَنَ ؕ اِنَّ رَبَّنَا لَغَفُوۡرٌ شَکُوۡرُ
🔷तमाम तारीफ और शुक्र है उस ख़ुदा के लिये है, जिसने हमसे ग़म दूर कर दिया। यक़ीनन हमारा रब माफ़ करने वाला और क़द्र करने वाला है।
📖 सूरह फ़ातिर 35:34
📑 अहम बातें:
◆जन्नत में दाख़िल होने पर ईमान वाले अल्लाह रब्बुल इज्जत का शुक्र इन अल्फ़ाज़ में अदा करेंगे।
🌺 जन्नत की नेअमतों का बयान :
📑क़ुरआन और सहीह अहादीस में जन्नत की कई नेअमतों का बयान आया है। उनमें से कुछ का मफ़हूम इस तरह है::
✨अल्लाह अहले जन्नत से राजी होगा और वो अल्लाह से राजी होंगे, और हकीकत यही है कि अल्लाह की रजामंदी सबसे बेहतर नेअमत और सबसे बड़ी कामयाबी है। अल्लाह अहले जन्नत से कभी नाराज नहीं होगा।
📒 सूरह आले इमरान 3:15, सूरह मायदा 5:119, सूरह तौबा 9:72, सहीह मुस्लिम 7518, 7140
✨जन्नत में मिलने वाली सबसे बड़ी नेअमत अल्लाह तआला का दीदार है। जन्नत में अल्लाह तआला पर्दा उठा देगा और जन्नतियों को अपने रब के दीदार से बढ़ कर कोई चीज प्यारी नहीं होगी।
📒 सहीह बुखारी 7434, सहीह मुस्लिम 449,450
✨अल्लाह रब्बुल इज्जत और मुकर्रब फरिश्तों की तरफ से जन्नतियों को सलाम कहा जायेगा।
📒 सूरह राद 13:23
✨अहले जन्नत अपने परवरदिगार की तस्बीह करेंगे, जिस तरह हम अपने आप सांस लेते हैं उसी तरह अल्लाह की हम्द और पाकीजगी बयान करना उनमें इलहाम कर दिया जाएगा।
📒 सहीह मुस्लिम 7154,55
✨अल्लाह तआला अपनी खास मेहरबानी से हमेशा रहने वाली जन्नतों में सच्चे अहले ईमान को दाखिल करेगा जहाँ वो हमेशा रहेंगे। वहाँ से उन्हें कभी भी नहीं निकाला जायेगा। न ही जन्नतियों को कभी मौत आएगी।
📒 सूरह फ़ातिर 35:33, सूरह हिज्र 15:48, सहीह मुस्लिम 7157
✨वहाँ उन्हें किसी भी तरह का गम नहीं होगा। उन्हें न तो कोई मेहनत मशक़्क़त करनी होगी और न ही उन्हें किसी किस्म की थकान महसूस होगी। वो कभी भी तंगहाली और जहमत के शिकार न होंगे।
📒 सूरह फ़ातिर 35:34-35, सहीह मुस्लिम 7156,57
✨जन्नत में हर शख्स शादी शुदा होगा। हर चीज पर क़ुदरत रखने वाला खालिक, जन्नत में अहले ईमान की बीवियों को फिर से नए सिरे से पैदा करेगा और जन्नत में उन्हें शौहर से मुहब्बत करने वाली और उनके हमउम्र जवान, कुंवारी और खूबसूरत बना कर उनके जोड़े को कामिल करेगा।
📒 सूरह वाकियाह 56:35-37 सहीह मुस्लिम 7147
✨अल्लाह जन्नतियों का निकाह खूबसूरत आंखों वाली हूरों से करवा देगा। इन बाहया हूरों की पाकी का ये हाल होगा कि कि इन्हें किसी इन्सान या जिन्न ने छुआ तक न होगा।
📒 सूरह तूर 52:20, सूरह रहमान 55:56
✨अल्लाह जन्नत में ईमान वालो को उनके नेक रिश्तेदारों से इस तरह से मिलाएगा की कम दर्जे वाले जन्नती को बेहतर दर्जे वाले जन्नती के साथ दाखिल कर देगा।
📒 सूरह राद 13:23, सूरह तूर 52:21
✨दुनिया में अगर किसी वजह से मोमिन भाइयों में आपसी नफरत या रंजिश भी रही होगी तो जन्नत में अल्लाह उनके दिल पाक कर देगा।
📒 सूरह आराफ 7:43, सूरह हिज्र 15:47
✨जन्नत में अहले ईमान किसी भी तरह की लग्व, बेहूदा और गुनाह की बात नहीं सुनेंगे, बल्कि वहां हर बात सलामती की होगी।
📒 सूरह गाशियाह 88:11, सूरह वाकियाह 56:25
✨अहले जन्नत का हुस्न व जमाल वक़्त के साथ हमेशा बढ़ता रहेगा। उन्हें बुढ़ापा नहीं आएगा और वो हमेशा जवान रहेंगे। वो हमेशा तंदरुस्त रहेंगे, कभी बीमार न होंगे।
📒 सहीह मुस्लिम 7146,7156,7157
✨जन्नतियों को सोने के कंगनों और मोतियों से सजाया जायेगा।
📒 सूरह फ़ातिर 35:33
✨जन्नतियों का लिबास हरे रंग के उम्दा रेशम का बना होगा जो कभी भी पुराना नहीं होगा।
📒 सूरह फ़ातिर 35:33, सूरह कहफ़ 18:31, सहीह मुस्लिम 7156
✨छिपा कर रखे गए मोतियों जैसे खूबसूरत नौजवान लड़के उनके खास खादिम होंगे जो हमेशा जवान रहेंगे।
📒 सूरह तूर 52:26, सूरह वाकियाह 56:17
✨जन्नत की चौड़ाई आसमानों और जमीन के बराबर है।
📒 सूरह आले इमरान 3:133
✨जन्नत में इतने बड़े दरख़्त(पेड़) है कि एक तेज रफ्तार घुड़सवार सौ साल तक उसकी छांव में चलकर भी उसे पार नहीं कर सकता।
📒 सहीह मुस्लिम 7139
✨जन्नती आलीशान महलों में रहेंगें।
📒 सूरह तौबा 9:72
✨जन्नतियों को खास मेहमानों की तरह ऊँचे शाही तख्तों पर बिठाया जाएगा जिन पर सोने और जवाहरात जड़े होंगे, जिन पर मखमली तकीये और मसनदें होगी जहां उनकी खातिरदारी में भरे हुये जाम पेश किए जायेंगे।
📒 सूरह गाशियाह 88:13-16, सूरह तूर 52:20, सूरह वाकियाह 56:15
✨जन्नत में कई दिलकश नहरें और पाक झरने होंगे।
📒 सूरह आले इमरान 3:15, सूरह मायदा 5:119
✨जन्नत में पानी, दूध, शहद और पाक शराब की नहरें होंगी।
📒 सूरह मुहम्मद 47:15
✨जन्नत में मिलने वाली पाक शराब से ऐसा नशा पैदा नहीं होगा जैसा दुनिया में होता है जिससे कि आदमी बेहूदगी, गाली गलौच और गुनाह के काम करने लगता है। न तो इससे सिर दर्द होगा और न ही इसे पीकर वो बहकेगें।
📒 सूरह तूर 52:23, सूरह वाकियाह 56:19
✨जन्नत में हर किस्म के मेवे, फल और गोश्त मयस्सर होंगे।
📒 सूरह मुहम्मद 47:15, सूरह तूर 52:22, सूरह यासीन 36:57
✨रब्बे करीम ने मोमिनों के लिए जन्नत में ऐसी नेअमतें रखी है जिसे आज तक किसी आँख ने नहीं देखा, किसी कान ने वहां की नेमतों का असल तजकिरा नहीं सुना, इससे भी बढ़कर किसी इन्सान के दिल में उनका ख्याल भी नहीं गुजरा है। ये नेमतें ऐसी होंगी की बाअमल मोमिनीन की आँखे उन्हें देखकर ठंडी हो जायेगी और वो अपने रब से राजी हो जायेगें। इन बेशुमार नेमतों में से कुछ का ही जिक्र क़ुरआन और अहादीस में मिलता है और वो भी सिर्फ तशबीह(उदाहरण) की शक्ल में बताई गई है उनकी असल नौईयत अल्लाह के इल्म में ही है।
📒 सूरह सज्दा 32:17, सहीह मुस्लिम 7132,33
✨जन्नत में अहले ईमान को हर वो चीज हासिल होगी जिसकी वो तमन्ना करेंगे।
📒 सूरह यासीन 36:57
💠💠💠💠💠💠💠
◆हमें अल्लाह से जन्नतुल फिरदौस में नबी ﷺ के पड़ोस की दुआ करनी चाहिए। फरमाने मुस्तफा ﷺ है कि:
●जब अल्लाह से (दुआ) मांगो तो (जन्नतुल) फिरदौस मांगो, क्योंकि वो जन्नत का सबसे अफजल और सबसे बुलन्द हिस्सा है।…और इसके ऊपर रहमान का अर्श है और इसी से जन्नत की नहरें निकलती है।
📒 सहीह बुखारी 2790
🤲🏻अल्लाह से दुआ है कि वो बिना हिसाब किताब हमें जन्नतुल फिरदौस में दाखिल करे और अपने हबीब ﷺ का पड़ोस नसीब फरमाये।
📌आमीन या रब्बुल आलमीन
📌 दुआ – 29
🔷 जन्नत में घर हासिल करने के लिए हजरत आसिया अलै. की दुआ::
🔶 رَبِّ ابۡنِ لِیۡ عِنۡدَکَ بَیۡتًا فِی الۡجَنَّۃِ
🔷ऐ मेरे रब, मेरे लिये अपने पास जन्नत में एक घर बना दीजिये।
📖 सूरह तहरीम 66:11
📑 अहम बातें:
◆जालिम बादशाह फ़िरऔन की बीवी आसिया बिन्ते मुज़ाहिम अलै. एक सच्ची मोमिना थी। जो हजरत मूसा अलै. की दावत पर ईमान ले आई थी। ये फ़िरऔन की वही बीवी है जिन्होंने मूसा अलै. को नील नदी से निकाल कर उनकी परवरिश की। आप हजरत मूसा अलै. की माँ की तरह थी।
◆जब फ़िरऔन को आपके ईमान की खबर हुई तो उस बदबख़्त ने हजरत आसिया अलै. को तरह तरह की तकलीफें दी। इसके बावजूद जब आप अलै. ने ईमान से समझौता नहीं किया तो फ़िरऔन ने उन्हें शहीद कर दिया।
◆ उस वक्त आप अलै. ने परवरदिगार से ये दुआ की,
“मुझे इन जालिमों से निजात अता कर और मुझे अपने पास बुला ले और जन्नत में मेरे रहने के लिए अपने करीब एक घर अता फरमा।”
◆नबी ए अक़्दस सल्ल. ने हजरत आसिया अलै. को औरतों में कामिल /Perfect (ईमान वाला) बताया है।
📒 सहीह बुखारी 3411
◆नबी ए रहमत सल्ल. ने खबर दी है कि जन्नती औरतों में सबसे अफ़ज़ल 4 औरतों में से एक हजरत आसिया अलै. है।
📒 मुसनद अहमद 2663
◆हजरत आसिया जो मिस्र की मल्लिका(महारानी) थी, जिन्हें दुनिया का हर ऐश और आराम मयस्सर था। उन्होंने पूरी उम्र इस हाल में गुजारी थी कि इज्जत, शोहरत, दौलत के अंबार और बड़े बड़े महल और उनमें मौजूद दिलफ़रेब चीजें उनके कदम चूमती थी। उन्होंने ये सब छोड़ कर अपने इस्लाम की खातिर कुर्बान होना चुना। उन्होंने दुनिया की नेअमतों के बदले में तकलीफ और गम और बादशाही के बदले में शहीद होना क़बूल किया।
◆हजरत आसिया अलै. की शहादत हमें ये सबक देती है कि बदतरीन काफिर की सोहबत में रहकर भी अल्लाह के सच्चे बन्दों के ईमान में कमी नहीं आती। और वो कुफ्र से कुछ वक्त के लिए हासिल होने वाले दुनियावी आराम, आराइशों, लज्जतों, शहवतों और दिखावे को छोड़कर आख़िरत की हमेशा रहने वाली कामयाबी और सुकून को तरजीह(प्राथमिकता) देते हैं। और इस हक़ पर जमे रहने के लिए अपने जान-माल की बाजी लगा देने में जरा भी नहीं हिचकते।
◆हमें भी अल्लाह के करीब जन्नतुल फिरदौस में घर की दुआ करनी चाहिए। फरमाने मुस्तफा सल्ल. है कि:
●जब अल्लाह से (दुआ) मांगो तो (जन्नतुल) फिरदौस मांगो, क्योंकि वो जन्नत का सबसे अफजल और सबसे बुलन्द हिस्सा है।…और इसके ऊपर रहमान का अर्श है और इसी से जन्नत की नहरें निकलती है।
📒 सहीह बुखारी 2790
📌 दुआ – 30
🔷 मुहाजिरीन और अंसार रज़ि. और मुसलमान भाइयों के लिए दुआ::
🔶 رَبَّنَا اغۡفِرۡ لَنَا وَ لِاِخۡوَانِنَا الَّذِیۡنَ سَبَقُوۡنَا بِالۡاِیۡمَانِ وَ لَا تَجۡعَلۡ فِیۡ قُلُوۡبِنَا غِلًّا لِّلَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡا رَبَّنَاۤ اِنَّکَ رَءُوۡفٌ رَّحِیۡمٌ ﴿۱۰﴾
🔷ऐ हमारे रब! हमें और हमारे उन सब भाइयों को बख़्श दे जो हम से पहले ईमान लाए हैं और हमारे दिलों में अहले-ईमान के लिये कोई बुग्ज़ (विद्वेष) न रख, ऐ हमारे रब! तू बड़ा मेहरबान और लगातार रहम करने है।
📖 सूरह हश्र 59:10
📑 अहम बातें:
◆सूरह हश्र की आयात 8 और 9 में मुहाजिरीन और अंसार का जिक्र है। जिनके लिए बाद में ईमान कबूल करने वाले मुसलमानों की दुआ का ज़िक्र इस आयत 10 में किया गया है।
◆मुहाजिरीन और अंसार, अल्लाह के रसूल सल्ल. के सच्चे साथियों के 2 गिरोह हैं जिन्होंने रसूलल्लाह सल्ल. के मिशन में उनका साथ दिया। मदीना हिजरत के बाद नबी सल्ल. में मुहाजिरीन और अंसार में भाईचारा कायम करवाया था।
● मुहाजिरीन: ये वो सहाबा है जो हिजरत करके मदीना आये। इन्होंने अल्लाह के दीन के लिए अपने बीवी बच्चों, मां-बाप, माल-दौलत और घर-जायदाद की क़ुरबानी दी।
● अंसार: अंसार का मतलब होता है मदद करने वाला। ये मदीना में रहने वाले वो सहाबा है जिन्होंने नबी सल्ल. और मुहाजिरीन की मदद के लिए कुर्बानियां दी और ईसार किया। इन्होंने मुहाजिरीन को अपने माल-आमदनी, घर-जायदाद, जमीन-बागों और समाजी मर्तबे में हिस्सा दिया। ये मदद और ईसार का जज्बा इतना गैर मामूली था कि अहादीस में यहाँ तक जिक्र मिलता है कि एक मुहाजिर सहाबी को खाना खिलाने के खातिर एक अंसारी सहाबी और उनके बीवी बच्चे खुद भूखे सो गए क्योंकि खाना इतना कम था कि उनमें से एक शख्स ही खा सकता था।
📒 सहीह बुखारी 3798 (मफ़हूम)
◆इस दुआ का पैगाम है कि हमें प्यारे रसूल सल्ल. के ऐसे जाननिसार साहबा के लिए दुआ करनी चाहिए। उन्हीं की कुर्बानियों से अल्लाह का सच्चा दीन हम तक पहुँचा है। उनसे मुहब्बत करना, उनकी इज्जत करना और उनके लिए दुआ करना ईमान की निशानी है।
◆साथ ही ये दुआ हमें ये भी बताती है कि हमें मुसलमान भाई से कीना और बुग्ज़(जलन/विद्वेष) नहीं रखना चाहिए। आपसी मनमुटाव होना इंसानी जिंदगी का हिस्सा है लेकिन ये मनमुटाव कभी भी रिश्तों और ताल्लुकात को इस हद तक न ले जाएं कि पलटने का रास्ता न बचे। एक बन्दा ए मोमिन की यही कोशिश होती है कि वो जल्द से जल्द गलतफहमियां दूर करता और अपने ईमान वाले भाई से सुलह कर मामला दुरुस्त कर लेता है।
🔷मुसलमान भाई से अच्छे ताल्लुकात(संबंध) रखने के बारे में क़ुरआन और अहादीस के कई फरमान मौजूद है, मसलन इरशादे रब्बानी है:
★उस ख़ुदा से डरो जिसका वास्ता देकर तुम एक-दूसरे से अपने हक़ माँगते हो, और नाते-रिश्तों के ताल्लुक़ात को बिगाड़ने से बचो। यक़ीन जानो कि अल्लाह तुमपर निगरानी कर रहा है।
📖 सूरह निसा 4:1
★जो लोग उन रिश्तों को काटते हैं जिन्हें अल्लाह ने जोड़ने का हुक्म दिया है और जो ज़मीन में बिगाड़ फैलाते हैं, वो लानत के क़ाबिल हैं और उनके लिये आख़िरत में बहुत बुरा ठिकाना है।
📖 सूरह राद 13:25
★मोमिन तो एक-दूसरे के भाई हैं, इसलिये अपने भाइयों के बीच सुलह करा दो और अल्लाह से डरो, उम्मीद है कि तुम पर रहम किया जाएगा।
📖 सूरह हुजरात 49:10
●नबी-ए-रहमत सल्ल. ने फरमाया:
आपस में बुग्ज़ न रखो, हसद न करो, पीठ पीछे किसी की बुराई न करो। अल्लाह के बन्दों! आपस में भाई बन कर रहो, और किसी मुसलमान के लिए ये जायज़ नहीं कि अपने भाई से तीन दिन से ज्यादा सलाम कलाम करना छोड़ दे।
📒 सहीह बुखारी 6065
📌 दुआ – 31
🔷फित्नों से बचने के लिए हजरत इब्राहीम अलै. की दुआ:
🔶 رَبَّنَا عَلَیۡکَ تَوَکَّلۡنَا وَ اِلَیۡکَ اَنَبۡنَا وَ اِلَیۡکَ الۡمَصِیۡرُ ﴿۴﴾
رَبَّنَا لَا تَجۡعَلۡنَا فِتۡنَۃً لِّلَّذِیۡنَ کَفَرُوۡا وَ اغۡفِرۡ لَنَا رَبَّنَا ۚ اِنَّکَ اَنۡتَ الۡعَزِیۡزُ الۡحَکِیۡمُ ﴿۵﴾
🔷ऐ हमारे रब! हम ने तुझ पर ही भरोसा किया और हम ने तेरी ही तरफ़ रुजूअ कर लिया और (सभी को) तेरी ही तरफ पलटना है।
ऐ हमारे रब! हमें काफ़िरों के लिये फित्ना न बना दे। और ऐ हमारे रब! हमारे क़ुसूरों से दरगुज़र फ़रमा, बेशक तू ही ग़ालिब(प्रभुत्वशाली) और हकीम(तत्वदर्शी) है।
📖 सूरह मुमतहिना 60:4-5
📑 अहम बातें:
◆जब इब्राहीम अलै. और उनके साथियों ने इस्लाम की दावत अपनी कौम के सामने रखी और कौम ने उनकी मुखालिफत(विरोध) किया तो फिर हजरत इब्राहीम अलै. ने ये दुआ अपने रब से की।
◆ये दुआ दुश्मन कौम के फ़ितनों से बचने के लिए है।
अरबी लफ्ज़ ‛फित्ना’ के कई मायने हैं, मसलन : आजमाईश, दुख, रंज, रुसवाई, दीवानगी, इबरत, अजाब, मर्ज वगैरह।
यहाँ जिस मायने में फित्ना लफ्ज़ आया है वो आजमाईश के लिए है।
◆काफिरों के लिये अहले ईमान के फ़ित्ना बनने की कई सूरतें हो सकती हैं, जिनसे हर मोमिन को खुदा से पनाह मांगनी चाहिए:
1️⃣पहली सूरत ये की काफिर हम पर ग़ालिब(Overpowered) आ जायें और अपने गलबे को इस बात की दलील बना लें कि हम हक़ पर हैं और ये ईमान वाले बातिल(नाहक़) पर हैं वरना कैसे मुमकिन था कि खुदा की मदद इनके साथ होती और फिर हम इन पर ग़ालिब आ जाते।
2️⃣दूसरी सूरत ये हो सकती है कि ईमान वालों पर काफिरों का जुल्मो सितम बरदाश्त की हद से बढ़ जाये और इस हाल में ईमान वाले आखिरकार उनसे दब कर अपने दीन और अख्लाक का सौदा करने पर उतर आयें। ये हरकत दुनिया में मुसलमानों की जग हंसाई की वजह बनेगी और काफिरों को इससे दीन और दीन वालो को जलील करने का मौका मिल जायेगा।
3️⃣तीसरी सूरत ये हो सकती है कि दीन ए हक़ की नुमाइंदगी के ऊंचे मुकाम पर होने और खुदाई हिदायत हासिल होने के बावजूद मुसलमान अख़लाक़ी तौर पर इतने महरूम हों कि दुनिया उनकी सीरत और किरदार में भी वही कमियां देखे जो दूसरी मुशरिक और जाहिल कौमों में नजर आते हैं। उनके रंग-ढंग, खुशी-गमी, ख्वाब-मक़सद वैसे ही हो जैसे खुदा की दुश्मन कौमों के होते हैं। इससे काफिरों को कहने का मौका मिलेगा कि आखिर तुम्हारे इलाही निजाम (ईश्वरीय जीवन व्यवस्था) में वो क्या खूबी है जो उसे हमारे कुफ्र वाले निजाम(व्यवस्था) से उसे बेहतर बनाती है?
📌 दुआ – 32
🔷 नूर के मुकम्मल करने के लिए की दुआ:
🔶 رَبَّنَاۤ اَتۡمِمۡ لَنَا نُوۡرَنَا وَ اغۡفِرۡ لَنَا ۚ اِنَّکَ عَلٰی کُلِّ شَیۡءٍ قَدِیۡرٌ ﴿۸﴾
🔷ऐ हमारे रब, हमारा नूर हमारे लिये मुकम्मल(पूरा) कर दीजिए और हमें बख्श दीजिये, बेशक आप हर चीज़ पर क़ुदरत (सामर्थ्य) रखते हैं।
📖 सूरह तहरीम 66:8
📑 अहम बातें:
◆इस दुआ को समझने के लिए इस आयत के पहले हिस्से और सूरह हदीद 57:12-13 को मिला कर देखने पर पता चलता है कि कयामत के दिन एक मुसलमान के ईमान और आमाल के दर्जे के हिसाब से उसे एक किस्म का नूर हासिल होगा जो उसके आगे और दायीं ओर दौड़ रहा होगा।
◆ये मामला उस वक़्त होगा जब लोग हश्र के मैदान से जन्नत की तरफ जा रहे होंगे। वहां हर तरफ अंधेरा होगा जिसमें जहन्नमी लोग ठोकरे खा रहे होंगे, और रोशनी(नूर) सिर्फ अहले इमान के साथ होगी।
◆इस नाजुक मौके पर अंधेरे में भटकने वाले लोगों की चीख पुकार सुनकर अहले ईमान पर डर तारी हो रहा होगा, दुनिया में किये गए अपने कुसूर और अपनी कोताहियों का एहसास करके उन्हें अंदेशा होगा कि कहीं हमारा नूर भी न छीन लिया जाए, इसलिए वह अपने रब से दुआ करेंगे, “ऐ हमारे रब! हमारे कसूर माफ कर दे और हमारे नूर को जन्नत में पहुंचने तक बाकी रख।”
◆इब्ने जरीर तबरी रह. ने अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ि. का कौल नकल किया है: वो (अहले ईमान) अल्लाह तआला से दुआ करेंगे कि उनका नूर उस वक्त तक बाकी रखा जाए और उसे बुझने ना दिया जाए जब तक वह पुल-ए-सिरात से खैरियत के साथ ना गुजर जाएं।
◆इब्ने कसीर रह. ने उनका यह कौल नकल किया है : अहले ईमान जब देखेंगे मुनाफिकीन नूर से महरूम रह गए हैं तो वह अपने हक में नूर के मुकम्मल करने की ये दुआ करेंगे।
📒तफ़हीमुल क़ुरआन सूरह तहरीम 66:8 हाशिया 22
📌 दुआ – 33
🔷 फरमाबरदारी के इक़रार और खताबख्शी के लिए की दुआ:
🔶 سَمِعۡنَا وَ اَطَعۡنَا غُفۡرَانَکَ رَبَّنَا وَ اِلَیۡکَ الۡمَصِیۡرُ ﴿۲۸۵﴾
🔷हमने हुक्म सुना और फ़रमाँबरदार हुए। ऐ हमारे मालिक ! हम आपसे ग़लतियों पर माफ़ी चाहते हैं और हमें आपकी ही तरफ़ लौटना है।
📖 सूरह बक़रह 2:285
📑 अहम बातें:
◆सूरह बक़रह की इस आयत 285 के शुरुआती हिस्से में ईमान के बुनियादी अरकान(स्तंभों) का जिक्र है।
◆इन्हीं बुनियादी अक़ीदों का जिक्र मशहूर हदीस-ए-जिबरील में भी मिलता है।
📒 देखें: सहीह बुखारी 50, सहीह मुस्लिम 93, मिश्कात उल मसाबीह 02
◆इस आयत में तफ़सील में जाए बिना इस्लाम के अक़ीदे और इस्लामी तर्ज़े-अमल का ख़ुलासा बयान कर दिया गया है और वो ये है- अल्लाह को, उसके फ़रिश्तों को और उसकी किताबों को मानना, उसके तमाम रसूलों को तस्लीम करना बग़ैर इसके कि उनके बीच फ़र्क़ किया जाए (यानी किसी को माना जाए और किसी को न माना जाए) और इस बात को मानना कि आख़िरकार हमें उसके सामने हाज़िर होना है।
◆ये पाँच बातें इस्लाम के बुनियादी अक़ीदे (मूल धारणाएँ) हैं। इन अक़ीदों को क़बूल करने के बाद एक मुसलमान के लिये सही तर्ज़े-अमल ये है कि अल्लाह की तरफ़ से जो हुक्म पहुँचे, उसे वो दिल व जान से क़बूल करे। उसकी फ़रमाँबरदारी करे और अपने अच्छे कामों पर घमंड न करे, बल्कि अल्लाह से माफ़ी और दरगुज़र की दरख़ास्त करता रहे।
📌 दुआ – 34
🔷 इक़्तिदार हासिल करने और उसे कायम रखने के लिए दुआ:
🔶 اللّٰہُمَّ مٰلِکَ الۡمُلۡکِ تُؤۡتِی الۡمُلۡکَ مَنۡ تَشَآءُ وَ تَنۡزِعُ الۡمُلۡکَ مِمَّنۡ تَشَآءُ ۫ وَ تُعِزُّ مَنۡ تَشَآءُ وَ تُذِلُّ مَنۡ تَشَآءُ ؕ بِیَدِکَ الۡخَیۡرُ ؕ اِنَّکَ عَلٰی کُلِّ شَیۡءٍ قَدِیۡرٌ ﴿۲۶﴾
تُوۡلِجُ الَّیۡلَ فِی النَّہَارِ وَ تُوۡلِجُ النَّہَارَ فِی الَّیۡلِ ۫ وَ تُخۡرِجُ الۡحَیَّ مِنَ الۡمَیِّتِ وَ تُخۡرِجُ الۡمَیِّتَ مِنَ الۡحَیِّ ۫ وَ تَرۡزُقُ مَنۡ تَشَآءُ بِغَیۡرِ حِسَابٍ ﴿۲۷﴾
🔷ऐ अल्लाह! बादशाही के मालिक! तू जिसे चाहे बादशाही दे और जिससे चाहे छीन ले। जिसे चाहे इज़्ज़त दे और जिसे चाहे रुसवा कर दे, तमाम खैर(भलाई) तेरे ही इख़्तियार में है। बेशक तुझे हर चीज़ पर क़ुदरत(सामर्थ्य) हासिल है।
तू ही रात को दिन में पिरोता हुआ ले आता है और दिन को रात में। बेजान में से जानदार को निकालता है और जानदार में से बेजान को। और जिसे चाहता है बेहिसाब रोज़ी देता है।
📖 सूरह आले इमरान 3:26-27
📑 अहम बातें:
◆इन आयतों का पसमंजर ये है कि अहले किताब(यहूदी और ईसाई) इस्लाम की अजमत, इसके गलबे और नबी सल्ल. के किरदार को निशाना बनाते थे। इसके जवाब में अल्लाह ने अपने हबीब सल्ल. को ये दुआ सिखाई।
◆जब इनसान एक तरफ़ हक़ के इनकारियों और नाफ़रमानों की करतूत देखता है और फिर ये देखता है कि वे दुनिया में किस तरह फल-फूल रहे हैं, दूसरी तरफ़ ईमानवालों की फ़रमाँबरदारियाँ देखता है और फिर उनको उस ग़रीबी, मुफ़लिसी और उन मुसीबतों और दुखों का शिकार देखता है जिनमें नबी (सल्ल०) और आपके सहाबा किराम सन 03 हि० और उसके आस-पास के ज़माने में शिकार थे, तो क़ुदरती तौर पर उसके दिल में एक अजीब हसरत भरा सवाल घूमने लगता है कि आखिर इस दुनिया में बातिल का गलबा क्यों है?
अल्लाह तआला ने यहाँ इसी सवाल का जवाब दिया है और ऐसे लतीफ़ (सूक्ष्म) अंदाज़ में दिया है कि इससे ज़्यादा लताफ़त (सूक्ष्मता) का तसव्वुर नहीं किया जा सकता।
◆अल्लाह ने यहां ये बताया है कि बातिल की ये चंद रोज की बादशाहत देखकर अहले ईमान को दिल छोटा नहीं करना चाहिए क्योंकि इस कायनात का हकीकी बादशाह अल्लाह ही है। ऐसे सरकश बादशाह हर जमाने और हर जगह होते आये हैं जिन्होंने अहले ईमान पर सितम ढाए लेकिन बिल आखिर ये बदबख़्त अपने बुरे अंजाम को पहुँच गए। चाहे फ़िरऔन हो या नमरूद, जालूत हो या मक्का के कुरैश सरदार सब नामुराद हुए और अल्लाह के दीन का कुछ न बिगाड़ सके।
◆साथ में यह भी बताया गया कि कुछ इंसानों को कुछ इंसानों पर जो इज्जत और बरतरी हासिल होती है वो भी उसी की अता की हुई है। हकीम और अलीम रब किसी इन्सान को इक़्तिदार दे कर तो किसी से छीन कर उसके तर्जे अमल की जांच करता है।
◆इसी तरह बताया गया की ये इंसानी बादशाह जमीन के किसी टुकड़े पर हुकूमत करते हैं और वो हुकूमत भी बेमानी है। अगर उनकी रियासत में सूखा पड़ जाए या बाढ़ आ जाये तो उनकी यह हैसियत नहीं कि वो कुदरत को हुक्म दे कर इसे हल कर दें, इसके उलट हर चीज पर क़ुदरत रखने वाले असल बादशाह, रब तआला की बादशाही तमाम कायनात पर है। दुनिया में दिन रात का निजाम और मुर्दा से जिंदा और जिंदा से मुर्दा मखलूक का पैदा करना उसकी कुदरत की दो मिसालें है।
📌 दुआ – 35
🔷 अल्लाह से नेक औलाद माँगने की दुआ::
🔶 رَبِّ ہَبۡ لِیۡ مِنۡ لَّدُنۡکَ ذُرِّیَّۃً طَیِّبَۃً ۚ اِنَّکَ سَمِیۡعُ الدُّعَآءِ ﴿۳۸﴾
🔷ऐ मेरे रब! मुझे अपने पास से नेक औलाद अता फ़रमाइये। बेशक आप ही दुआ सुनने वाले है।
📖 सूरह आले इमरान 3:38
📑 अहम बातें:
◆इस आयत का पसमंजर ये है कि हजरत जकरिया अलै. हजरत मरियम अलै. की देखभाल के जिम्मेदार थे। जब वो कभी हजरत मरयम अलै. के मेहराब में जाते तो वहाँ पाते कि अल्लाह ने हजरत मरयम अलै. के लिए रिज्क का इंतजाम कर रखा है।
◆हज़रत जकरिया अलै. उस वक़्त तक बे-औलाद थे। और उस नौजवान नेक लड़की को देखकर फ़ितरी तौर से उनके दिल में यह तमन्ना पैदा हुई कि काश अल्लाह उन्हें भी ऐसी ही नेक औलाद दे! और ये देखकर कि अल्लाह किस तरह अपनी क़ुदरत से इस गोशानशीन (एकान्तवासी) लड़की को रोज़ी पहुँचा रहा है, उन्हें ये उम्मीद हुई कि अल्लाह चाहे तो इस बुढ़ापे में भी उनको औलाद दे सकता है। हालांकि उनकी उम्र भी बहुत ज्यादा हो गई थी और उनकी बीवी भी बाँझ थी। लेकिन उन्हें अल्लाह की कुदरत पर पूरा भरोसा था, जिसकी वजह से उन्होंने अपने रब से नेक औलाद की इल्तिजा की। अल्लाह ने उनकी ये दुआ कबूल की और उन्हें याह्या अलै. जैसा नेक वारिस अता किया।
◆इस वाकिये से मालूम होता है कि एक मोमिन को कभी भी अल्लाह की रहमत से मायूस नहीं होना चाहिए।
हजरत याकूब अलै. ने इस सबक को इन अल्फ़ाज़ में बताया कि:
अल्लाह की रहमत से कभी मायूस न हो, क्योंकि हकीकत ये है कि अल्लाह की रहमत से काफ़िर ही मायूस होते हैं।
📖सूरह यूसुफ 12:87
◆काबिले गौर बात है कि जकरिया अलै. ने नेक औलाद की दुआ की, न कि नेक बेटे की। इससे मालूम हुआ है कि इस्लाम, औलाद के नेक सीरत होने को ज्यादा अहमियत देता है, न कि उनकी जिन्स (लिंग) को। चाहे बेटा हो या बेटी, दोनों अल्लाह की नेअमत है। हमारी दुआ ये नहीं होनी चाहिए कि हमें औलाद की शक्ल में हर हाल में बेटा ही मिले। बल्कि हमें दुआ करनी चाहिए कि हमारी अगली नस्ल चाहे बेटा हो या बेटी; अल्लाह की इबादतगुजार, उसके नबियों की तालीमात पर अमल करने वाली और दीन-ए-इस्लाम के लिए जान माल की कुर्बानी देने वाली हो।
📌 दुआ -36
🔷 अल्लाह से नेक औलाद माँगने की दुआ::
🔶 رَبِّ ہَبۡ لِیۡ مِنَ الصّٰلِحِیۡنَ ﴿۱۰۰﴾
🔷ऐ मेरे परवरदिगार! मुझे सालेह(नेक) औलाद अता फरमा।
📖 सूरह साफ्फात 37:100
📑 अहम बातें:
◆ये खलीलुल्लाह हजरत इब्राहीम अलै. की दुआ है।
इस दुआ से यह बात मालूम होती है कि उस वक्त तक हजरत इब्राहीम अलै. बेऔलाद थे।
◆अपनी कौम के रवैये से मायूस होकर उन्होंने अल्लाह को पुकारा कि परवरदिगार मुझे अपनी कौम और खानदान के बदले सालेह औलाद अता फरमा जो बेवतनी और तन्हाई की हालत में मेरी गमख्वार और मददगार हो। जो औलाद मेरे तौहीद के मिशन की अलमबरदार हो और जो मेरी दावत में मेरा साथ दे।
◆सालेह का मतलब है वो इंसान जो बिगाड़ और खराबियों को सुधारने में लगा रहता हो, आमतौर से सालेह का तर्जुमा नेक किया जाता है क्योंकि नेक आदमी खुद को, अपने आप-पास के लोगों को और समाज को अल्लाह के बताए हुए तरीके से सुधारने में लगा रहता है।
◆याद रहे सालेह(नेक) होना एक ऊंचा मुकाम है जिसकी दुआ अल्लाह के कई नबियों ने की मसलन::
★इब्राहीम अलै. ने खुद अपने लिए दुआ की:
ऐ मेरे रब! मुझे हिक्मत(फैसला करने की कुव्वत) अता कर और मुझे सालेह लोगों में शामिल कर।
📖सूरह शुअरा 26:83
★युसूफ अलै. ने दुआ की:
(ऐ मेरे परवरदिगार!) मुझे इस हालत में दुनिया से उठाना कि मैं तेरा फरमाबरदार(मुस्लिम) हूँ, और मुझे सालेह लोगों के साथ मिला दे।
📖सूरह यूसुफ 12:101
★सुलैमान अलै. ने दुआ की:
(ऐ मेरे रब!) मैं ऐसे सालेह अमल करूँ जो तुझे पसंद आये और तू अपनी रहमत से मुझे अपने सालेह बन्दों में दाखिल फरमा।
📖सूरह नम्ल 27:19
📌 दुआ -37
🔷 जालिम बस्ती से हिजरत करने और जालिम कौम से निजात के लिए की दुआ::
🔶 رَبَّنَاۤ اَخۡرِجۡنَا مِنۡ ہٰذِہِ الۡقَرۡیَۃِ الظَّالِمِ اَہۡلُہَا ۚ وَ اجۡعَلۡ لَّنَا مِنۡ لَّدُنۡکَ وَلِیًّا ۚ ۙ وَّ اجۡعَلۡ لَّنَا مِنۡ لَّدُنۡکَ نَصِیۡرًا ﴿ؕ۷۵﴾
🔷ऐ हमारे रब! हमको इस बस्ती से निकाल जिसके लोग ज़ालिम हैं, और अपनी तरफ़ से हमारा कोई हिमायती और मददगार पैदा कर दे।
📖 सूरह निसा 4:75
📑 अहम बातें:
◆यह उन मज़लूम बच्चों, औरतों और मर्दों की दुआ है जो मक्का में और अरब के दूसरे क़बीलों में इस्लाम क़बूल कर चुके थे मगर न हिजरत करने की ताक़त रखते थे और न अपने आप को ज़ुल्म से बचा सकते थे। इन बेचारों पर तरह-तरह के ज़ुल्म ढाए जा रहे थे। वे लोग दुआएँ माँगते थे कि कोई उन्हें इस ज़ुल्म से बचाए। ऐसे मजलूम मुसलमानों के लिए खुद नबी सल्ल. दुआ करते थे। [देखें सहीह बुखारी:804]
◆इस आयत के शुरुआती हिस्से में अल्लाह तआला ने वाजेह किया है कि ऐसे मजलूमों की मदद के लिये जान माल की बाजी लगाना हर मुसलमान के ईमान का अहम तक़ाज़ा है।
◆अफसोसनाक बात है कि इस वक़्त दुनिया में कई देशों में मुसलमानों पर तरह तरह से जुल्म तोड़े जा रहे हैं, उन्हें गुलाम बनाया जा रहा है, तरह तरह के जालिमाना कानून थोपे जा रहे हैं, उन्हें न हिजरत करने दी जाती है और न ही वहाँ चैन से रहने दिया जाता है। ये सब सितम उन पर सिर्फ इसलिये होते हैं कि उन्होंने एक अल्लाह को अपना रब तस्लीम किया है और तागूत(अधर्म) के आगे झुकने से इनकार कर दिया है।
◆ऐसे मजलूमों की खैर ख़्वाही का जज्बा हमारे अंदर होना ईमान की अलामत है। और जिस हद तक हम उनकी मदद कर सकते हों, बढ़ चढ़कर उनकी मदद करनी चाहिए।
◆एक ईमान वाले भाई – बहन के दर्द का अहसास हमें होना ही चाहिए क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्ल. का इरशाद है:
🔷तुम मोमिनों को एक दूसरे के साथ रहमत और मेहरबानी करने ,मुहब्बत और मुआवनत(साथ देने) में एक जिस्म की तरह पाओगे, जब जिस्म का कोई एक हिस्सा(अंग) तकलीफ में होता है तो पूरा जिस्म बेदारी और बुखार में मुब्तला रहता है।
📒सहीह बुखारी 6011, सहीह मुस्लिम 6586
📌 दुआ -38
🔷 जालिम कौम से निजात पाने के लिए हजरत मूसा अलै. की दुआ::
🔶 رَبِّ نَجِّنِیۡ مِنَ الۡقَوۡمِ الظّٰلِمِیۡنَ ﴿۲۱﴾
🔷ऐ मेरे रब, मुझे ज़ालिम लोगों से बचा ले।
📖 सूरह क़सस 28:21
📑 अहम बातें:
◆मिस्र से निकलते वक्त हजरत मूसा अलै. ने फ़िरऔन के शर से बचने के लिए ये दुआ मांगी थी। जिसके नतीजे में अल्लाह तआला ने उन्हें खैरियत के साथ मदयन में अमन(सुरक्षा) अता किया।
📌 दुआ -39
🔷 हिजरत के मौके पर रसूलल्लाह सल्ल. की इक़्तिदार माँगने की दुआ::
🔶 رَّبِّ اَدۡخِلۡنِیۡ مُدۡخَلَ صِدۡقٍ وَّ اَخۡرِجۡنِیۡ مُخۡرَجَ صِدۡقٍ وَّ اجۡعَلۡ لِّیۡ مِنۡ لَّدُنۡکَ سُلۡطٰنًا نَّصِیۡرًا ﴿۸۰﴾
🔷ऐ मेरे परवरदिगार! मुझे आप जहाँ भी दाखिल करें, सच्चाई के साथ दाखिल करें और जहाँ से भी निकालें, सच्चाई के साथ निकालें, और अपनी तरफ़ से एक इक़्तिदार(सत्ता) को मेरा मददगार बना दे।
📖 सूरह बनी-इस्राईल 17:80
📑 अहम बातें:
◆हजरत इब्ने अब्बास रज़ि का कौल है कि रसूलल्लाह सल्ल. मक्का में थे, फिर आप को हिजरत का हुक्म मिला तो उस मौके पर ये आयत नाजिल हुई।
📒 जामेअ तिर्मिज़ी 3139
◆जब किसी जगह इस्लाम पर अमल करना मुश्किल हो जाये तो अल्लाह की राह में अपने घर-बार को छोड़ कर किसी दूसरी जगह बसने को हिजरत कहते हैं। अल्लाह ने अपने नबी सल्ल. से फरमाया की इस नाजुक मौके पर तुम्हारी दुआ ये होनी चाहिये कि मुझसे सच्चाई का दामन किसी हाल में न छूटे, जहाँ से भी निकलूं सच्चाई की ख़ातिर निकलूं और जहाँ भी जाऊं सच्चाई के साथ जाऊं।
🔷 इस्लाम के गलबे के लिए इक़्तिदार की जरूरत:
नबी सल्ल. को इस दुआ में ये ताकीद की गई कि वो अल्लाह से मददगार क़ुव्वत/सत्ता मांगे यानी वो दुआ करे कि:-
★अल्लाह या तो मुझे(नबी सल्ल. को) ख़ुद इक़्तिदार दे, या किसी हुकूमत को मेरा मददगार बना दे, ताकि उसकी ताक़त से मैं दुनिया के इस बिगाड़ को ठीक कर सकूं, बेहयाई और गुनाहों के इस सैलाब को रोक सकूं, और तेरे इन्साफ़ से भरे क़ानून को लागू कर सकूं। यही मतलब है इस आयत का जो हसन बसरी और क़तादा ने बयान किया है, और इसी को इब्ने-जरीर और इब्ने-कसीर जैसे बड़े तफ़सीर लिखनेवालों ने अपनाया है और इसी की ताईद हजरत उमर और हजरत उस्मान रज़ि का ये क़ौल करता है:
⚡ अल्लाह हुकूमत की ताक़त से उन चीज़ों की रोकथाम कर देता है जिनकी रोकथाम क़ुरआन से नहीं करता।
📘 अन्निहाया- इब्ने असीर 5/180, तारीखे बगदाद – खतीब 4/108
◆इससे मालूम हुआ कि इस्लाम दुनिया में जो सुधार चाहता है वो सिर्फ़ नसीहतों से नहीं हो सकता, बल्कि उसको अमल में लाने के लिये सियासी ताक़त भी दरकार है। फिर जबकि ये दुआ अल्लाह ने अपने नबी को ख़ुद सिखाई है तो इससे ये भी साबित हुआ कि दीन क़ायम करने और शरीअत लागू करने और अल्लाह की मुक़र्रर की हुई सज़ाएँ जारी करने के लिये हुकूमत चाहना और उसको पाने की कोशिश करना न सिर्फ़ जाइज़, बल्कि ज़रूरी और तारीफ़ के क़ाबिल है और वो लोग ग़लती पर हैं जो इसे दुनियापरस्ती या दुनियातलबी कहते हैं। दुनियापरस्ती अगर है तो यह है कि कोई शख़्स अपने लिये हुकूमत का तलबगार हो। रहा ख़ुदा के दीन के लिये हुकूमत का तलबगार होना तो ये दुनियापरस्ती नहीं, बल्कि बिलकुल ख़ुदापरस्ती ही का तक़ाज़ा है।
◆हमें भी हक़ के गलबे के लिए अल्लाह से दुआ करनी चाहिए और अपनी नीयत को खालिस करते हुए कौम, जात, जमातों और फिरकों की सोच से ऊपर उठकर सिर्फ इस्लाम की सरबुलन्दी के लिए सियासी जद्दोजहद कर इक़्तिदार हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए।
📌 दुआ – 40
🔷 अल्लाह की दी हुई हिदायत और नेअमतों की क़द्र करने वाले शख्स की दुआ::
🔶 قَالَ رَبِّ اَوۡزِعۡنِیۡۤ اَنۡ اَشۡکُرَ نِعۡمَتَکَ الَّتِیۡۤ اَنۡعَمۡتَ عَلَیَّ وَ عَلٰی وَالِدَیَّ وَ اَنۡ اَعۡمَلَ صَالِحًا تَرۡضٰہُ وَ اَصۡلِحۡ لِیۡ فِیۡ ذُرِّیَّتِیۡ ۚ ؕ اِنِّیۡ تُبۡتُ اِلَیۡکَ وَ اِنِّیۡ مِنَ الۡمُسۡلِمِیۡنَ ﴿۱۵﴾
🔷ऐ मेरे रब, मुझे तौफ़ीक़ दे कि मैं तेरी उन नेमतों का शुक्र अदा करूँ जो तूने मुझे और मेरे माँ-बाप को अता की और ऐसा नेक अमल करूँ जिससे तू राज़ी हो और मेरे लिए मेरी औलाद की इस्लाह कर दे। मैं तेरे सामने तौबा करता हूँ और फ़रमाँबरदार (मुस्लिम) बन्दों में से हूँ।
📖 सूरह अल-अहक़ाफ़ 46:15
📑 अहम बातें:
◆ यह उस ईमान वाले शख्स की दुआ का बयान है जो 40 साल की पक्की उम्र तक पहुँच चुका है। अल्लाह के एहसानों की और अपने वालिदैन के एहसानों की कीमत समझता है। अल्लाह की बन्दगी करके, बुरे कामों से रुकते हुए और अच्छे काम करते हुए, अल्लाह का शुक्र अदा करता है और वालिदैन के साथ हुस्ने सुलूक करके उनका शुक्र अदा करता है।
◆ ऐसा शख़्स अल्लाह से हमेशा शुक्र-गुजार बन्दा बनने की दुआ करता रहता है और उसे हमेशा अपनी औलाद की फ़िक़्र लगी रहती है। वो अपनी औलाद को अल्लाह का फरमाबरदार बनाने के लिए सारी कोशिशें करता है और अल्लाह से भी उनके नेक बन जाने की दुआ करता है।
◆ अल्लाह भी अपने ऐसे बन्दों को बहुत पसंद करते हैं, उनके नेक आमाल क़ुबूल करते है और उनकी गलतियों को माफ़ कर देते है और उन्हें जन्नत में दाखिल करने का वादा करते है।
◆ हमें भी अल्लाह की नेअमतों का शुक्र करना चाहिए। ख़ासतौर से ईमान की नेअमत पर और माँ-बाप का साया हम पर मौजूद होने की नेअमत पर हमें अल्लाह का बहुत-बहुत शुक्र करना चाहिए। अल्लाह ने क़ुरआन में लगभग 4 जगह अपने जिक्र के बाद वालिदैन का जिक्र किया है और खुद का शुक्र करने के साथ-साथ वालिदैन का भी शुक्र अदा करने का हुक्म दिया है तो हमें वालिदैन के साथ हुस्न-ए-सुलूक करना चाहिए, वालिदैन का दिल दुखाने से परहेज़ करना चाहिए। इसके साथ-साथ हम में से जिनको भी अल्लाह ने औलाद की नेमत से नवाज़ा है हमें इस अमानत का भी हक़ अदा करने वाला बनना चाहिए। औलाद का ईमान मजबूत करने, उनको क़ाबिल और नेक बनाने के लिए खुद भी कोशिश करनी चाहिए और अल्लाह से भी दुआ करनी चाहिए।
📌 दुआ – 41
🔷 मुसाफिर को अलविदा कहने की दुआ::
🔶 فَاللّٰہُ خَیۡرٌ حٰفِظًا ۪ وَّ ہُوَ اَرۡحَمُ الرّٰحِمِیۡنَ ﴿۶۴﴾
🔷 अल्लाह ही बेहतर हिफ़ाज़त करने वाला है और वह सबसे बढ़कर रहम करने वाला है।
📖 सूरह यूसुफ 12:64
📑 अहम बातें:
◆ हजरत याक़ूब अलै. ने अपने बेटे बिन यमीन को विदा करते वक़्त ये अल्फ़ाज़ कहे। इस दुआ की ऐसी बरकत हुई कि अल्लाह ने बिन यमीन के साथ उनके दूसरे बेटे हजरत यूसुफ अलै. से भी उन्हें मिला दिया।
◆आयत 63 में बिन यमीन के भाइयों ने कहा था, “हम बिन यमीन की हिफाजत की जिम्मेदारी लेते हैं।” इस पर हजरत याक़ूब अलै. का ये दुआईयाना जवाब वाजेह करता है कि अल्लाह का बंदा अल्लाह पर ही तव्वकुल और भरोसा करता है। चाहे जाहिरी तौर पर कितने ही बेहतर हालात और वसाइल हो, अगर अल्लाह की मर्ज़ी शामिल न हो तो इन्सान का हर सफर, हर काम और हर इरादा नाकाम हो जाता है और नतीजे में भलाई की जगह बुराई हासिल होती है।
◆अल्लाह के अम्बिया अलै. और उनके सच्चे साथी रज़ि. हर मामले में अल्लाह पर ही भरोसा करते थे। उनका ईमान था कि मसलों को हल करना, बीमारी दूर करना, सफर में हिफाजत करना, नेक औलाद देना, बारिश बरसाना, रिज्क की तंगी दूर करना जैसे तमाम कामों का इख्तियार सिर्फ और सिर्फ अल्लाह रब्बुल इज्जत के हाथों में है। और असल तौहीद यही है कि बन्दा हर मामले में अपने रब से उम्मीद रखे न की किसी नबी, वली, नेक आदमी, फरिश्ते या जिन्न से।
◆अक्सर हम देखते हैं कि घर के बड़े लोग, बच्चों की हिफाजत के लिए अलग अलग किस्म के तावीजों और धागों पर भरोसा करते हैं। ये एक गैर इस्लामी और बिदअत वाला अमल है जो शिर्क के दरवाजे खोल देता है।
🔷अल्लाह के सच्चे नबी ﷺ ने तावीज पहनने वाले शख्स से बैअत नहीं ली और फरमाया:
⚡जिसने तावीज लटकाया उसने शिर्क किया।
📒मुसनद अहमद : 16781, सिलसिला सहीहाह : 2961/492
🔷इसी तरह आप ﷺ के एक सहाबी बीमार हुए तो कुछ लोगों ने मशवरा दिया कि इनके इलाज के लिए कोई तावीज क्यों नहीं लटका देते? इस पर आप ﷺ ने तम्बीह (ख़बरदार) करते हुए फरमाया:
⚡जिसने कोई चीज लटकाई वो उसी के हवाले कर दिया गया।
📒जामेअ तिर्मिज़ी : 2072, मुसनद अहमद : 7741/18988
🔷आपके सहाबा रज़ि. भी आपके इसी नमूने पर अमल करने वाले थे। एक बार हजरत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ि. ने अपनी बीमार बीवी के हाथ में एक धागा बंधा हुआ देखा। उन्होंने सख्ती से उसे तोड़ दिया और कहा,“अब्दुल्लाह के घर वाले शिर्क से बरी हैं। हमने रसूलल्लाह ﷺ से जो बात याद की है वो ये है कि:
⚡(गैर इस्लामी) दम, तावीज और जादू सब शिर्क है।”
📒सिलसिला सहीहाह : 996/2972
◆हमें भी अपने बच्चों और बड़ो को इन अल्फ़ाज़ से विदा करना चाहिए और अपना भरोसा सिर्फ और सिर्फ अल-अहद (अकेले खुदा) पर रखना चाहिए।
📌 दुआ – 42
🔷 सफर के लिए सवार होने और नई जगह जाने पर बरकत के लिए दुआ::
🔶 رَّبِّ اَنۡزِلۡنِیۡ مُنۡزَلًا مُّبٰرَکًا وَّ اَنۡتَ خَیۡرُ الۡمُنۡزِلِیۡنَ ﴿۲۹﴾
🔷 ऐ परवरदिगार! मुझे बरकत वाली जगह उतार और तू बेहतरीन जगह देने वाला है।
📖 सूरह मूमिनून 23:29
📑 अहम बातें:
◆ हजरत नूह अलै. ने तकरीबन 950 साल तक अपनी कौम को एक अकेले रब की इबादत की दावत दी, लेकिन
कौम ने सरकशी इख्तियार की और रसूल की दावत का इनकार कर दिया। इस मौके पर हजरत नूह अलै. को एक कश्ती बनाने का हुक्म हुआ। जब नूह अलै. इस कश्ती में सवार हुए तो उन्होंने ये दुआ की।
◆“ बरकत वाली जगह उतार… ” यहां उतारने से मतलब सिर्फ ये नहीं है कि ऐ अल्लाह! हमें अच्छी जगह पर उतार दे या हम महफूज जगह तक पहुंच जाए। बल्कि इसके साथ अरबी जबान के मुहावरे के मुताबिक ‛ मेजबानी ’ का मफ़हूम भी शामिल है।
जिस तरह सूरह यूसुफ में हजरत यूसुफ का मुबारक कौल है:
📌 اَلَا تَرَوۡنَ اَنِّیۡۤ اُوۡفِی الۡکَیۡلَ وَ اَنَا خَیۡرُ الۡمُنۡزِلِیۡنَ ﴿۵۹﴾
☆क्या तुम देखते नहीं हो कि मैं किस तरह पैमाना भरकर देता हूँ और कैसी अच्छी मेहमाननवाज़ी करने वाला हूँ।
📖 सूरह यूसुफ 12:59
🌟 यानी इस दुआ का मतलब ये है कि:
ऐ हमारे परवरदिगार!….
●हम इस सवारी पर सवार हुए हैं, लेकिन मुस्तकबिल(भविष्य) की हमें कुछ खबर नहीं है! हम नहीं जानते कि ये सफर और ये सवारी हमें सही-सलामत मंजिल तक पहुँचाएगी या रास्ते में ही हमें तक़्लीफों का सामना करना पड़ेगा। तू ही क़ुदरत रखता है कि हमारे इस सफर में बरकत पैदा हो जाए।
●तू हमें इस तरह उतार कि हमारा उतरना भी बाबरकत हो और जिस जगह हम उतरें(जायें) वो जगह भी बरकत वाली हो। हमें सफर के दौरान भी कोई परेशानी न उठानी पड़े और हम जिस जगह अपना पड़ाव करें और जहां भी हम ठहरें, वहां भी हर किस्म के दुख:तकलीफ से महफूज रहें। हर हाल में, हर वक़्त और हर जगह तेरी खास रहमत और बरकत हमारे साथ रहे।
●इस सरजमीन पर हम तेरे मेहमान है और तू ही हमारा मेजबान है। तू ही है जो हमारी जरूरतें पूरी करेगा, हमें रिज्क देगा और हमें हिफाजत अता करेगा।
🔷 अहादीस में एक दुआ ये भी मिलती है कि जब नबी ﷺ सवारी पर बैठते तो ये दुआ करते थे:
اللّٰہُ اَکْبَرْ ، اللّٰہ اَکْبَرْ ، ا للّٰہُ اَکْبَرْ
अल्लाह सबसे बड़ा है! अल्लाह सबसे बड़ा है! अल्लाह सबसे बड़ा है!
سُبْحَانَ الَّذِي سَخَّرَ لَنَا هَذَا، وَمَا كُنَّا لَهُ مُقْرِنِينَ، وَإِنَّا إِلَى رَبِّنَا لَمُنْقَلِبُونَ،
पाक है वो जात जिसने हमारे लिये इस सवारी को ख़िदमतगार बनाया वरना हम इन्हें क़ाबू में लाने की ताक़त न रखते थे, और एक दिन हमें अपने रब की तरफ़ पलटना है।
اللهُمَّ إِنَّا نَسْأَلُكَ فِي سَفَرِنَا هَذَا الْبِرَّ وَالتَّقْوَى، وَمِنَ الْعَمَلِ مَا تَرْضَى،
ऐ अल्लाह! हम तुझसे अपने इस सफर में नेकी और परहेजगारी मांगते हैं। और ऐसे काम का सवाल करते हैं, जिसे तू पसंद करे।
اللهُمَّ هَوِّنْ عَلَيْنَا سَفَرَنَا هَذَا، وَاطْوِ عَنَّا بُعْدَهُ،
ऐ अल्लाह! हम पर इस सफर को आसान कर दे और इसकी दूरी को हमारे लिए थोड़ा कर दे।
اللهُمَّ أَنْتَ الصَّاحِبُ فِي السَّفَرِ، وَالْخَلِيفَةُ فِي الْأَهْلِ،
ऐ अल्लाह! तू ही सफर में (हमारा) साथी है, और घर वालों(परिवार) का निगहबान है।
اللهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ وَعْثَاءِ السَّفَرِ، وَكَآبَةِ الْمَنْظَرِ،
ऐ अल्लाह! मैं सफर की तक़्लीफों से, रंज और गम से तेरी पनाह माँगता हूं।
وَسُوءِ الْمُنْقَلَبِ فِي الْمَالِ وَالْأَهْلِ○
और (इस बात से भी तेरी पनाह माँगता हूं) की जब मैं वापस आऊं तो अपने माल और घर वालों को बुरे हाल में पाऊँ।
{और जब आप सफर से लौट कर आते तो भी यही दुआ पढ़ते, मगर साथ ही ये अल्फ़ाज़ भी जोड़ देते:}
آيِبُونَ تَائِبُونَ عَابِدُونَ لِرَبِّنَا حَامِدُونَ○
हम लौटने वाले हैं,
हम तौबा करने वाले हैं,
हम (खास) अपने रब की इबादत करने वाले हैं,
हम उसी की तारीफ करने वाले हैं।
📒सहीह मुस्लिम 1342
📌 दुआ – 43
✨ वालिदैन के लिए जामेअ दुआ::
بســم الله الرحمــن الرحيــم
🔸 رَّبِّ ارۡحَمۡهُمَا كَمَا رَبَّيٰنِىۡ صَغِيۡرًا{۲۴}
🔹ऐ परवरदिगार!
जिस तरह इन्होंने (मेरे वालिदैन ने) रहमत और मुहब्बत के साथ मुझे बचपन में पाला है, आप भी इनके साथ रहमत का मामला कीजिए।
📖 सूरह बनी इस्राईल 17:24
📑 अहम बातें:
📌 दुआ – 44
✨ हक़ की दावत देने वालों के लिए दुआ::
﷽
🔸 رَبِّ اشۡرَحۡ لِیۡ صَدۡرِیۡ ﴿ۙ۲۵﴾ وَ یَسِّرۡ لِیۡۤ اَمۡرِیۡ ﴿ۙ۲۶﴾
وَ احۡلُلۡ عُقۡدَۃً مِّنۡ لِّسَانِیۡ ﴿ۙ۲۷﴾ یَفۡقَہُوۡا قَوۡلِیۡ ﴿۪۲۸﴾
🔹मेरे रब! मेरे लिए मेरा सीना खोल दे। और मेरे काम को मेरे लिये आसान कर दे। और मेरी ज़बान की गिरह (गुत्थी) सुलझा दे, ताकि लोग मेरी बात समझ सकें।
📖 सूरह ताहा 20:25-28
📃अहम बातें:
◆मूसा अलै. को नब्बूवत मिलने के बाद जब अल्लाह ने उन्हें फ़िरऔन के सामने हक़ की दावत देने का हुक्म दिया तो मूसा अलै. ने ये दुआ अल्लाह से की।
◆क्योंकि दीन की दावत का काम एक बहुत अजीम काम है, जिसके लिए बड़े दिल गुर्दे की जरूरत है इसलिए आप अलै. ने दुआ की कि मुझे वो सब्र,तहम्मुल, हिक्मत, बेखौफी और हौसला अता कर जो इस काम के लिए जरूरी है।
◆यह बहुत अहम दुआ है जो हर उस शख्स को याद होनी चाहिए जो दीन की दावत का मिशन लेकर उठा हो।
📌 दुआ – 45
✨ इल्म में इज़ाफ़े के लिए दुआ:
﷽
🔸 رَّبِّ زِدۡنِیۡ عِلۡمًا ﴿۱۱۴﴾
🔹ऐ परवरदिगार! मुझे और ज़्यादा इल्म दे।
📖 सूरह ताहा 20:114
📃अहम बातें:
📌 दुआ – 46
✨ बीमारी से निजात के लिए अय्यूब अलै. की दुआ::
﷽
🔸 اَنِّیۡ مَسَّنِیَ الضُّرُّ وَ اَنۡتَ اَرۡحَمُ الرّٰحِمِیۡنَ﴿ ۸۳﴾
🔹(ऐ परवरदिगार!) मुझे ये (बीमारी की) तक़लीफ़ पहुंची है और तू रहम करने वालों में सबसे बढ़कर रहम करनेवाला है।
📖 सूरह अम्बिया 21:83
📃 अहम बातें:
🔹अल्लाह ने जब हजरत अय्यूब अलै. को शदीद बीमारी में मुब्तिला किया तो आप अलै. ने अपने रब से ये दुआ की, जिसकी बरकत से आपको शिफ़ा मिली।
✨इस किस्से से हमें कई नसीहतें मिलती है:
1.) पहली ये कि अल्लाह के मुक़्क़रब और सच्चे बन्दे अपनी हर तक़लीफ़ में अल्लाह ही को मदद के लिए पुकारते हैं मसलन जब हजरत याक़ूब अलै अपने बेटे हजरत यूसुफ अलै. से जुदाई के गम में मुब्तिला हुए तो उन्होंने कहा:
✨मैं अपनी परेशानी और गम का शिकवा सिर्फ अल्लाह से करता हूँ।
📖 सूरह यूसुफ 12:86
2.) दूसरी ये कि अल्लाह तआला अपने बन्दों को कई तरह से आजमाता है, लेकिन अल्लाह के सच्चे बन्दे सब्र और शुक्र की रविश अपनाते हैं, और अल्लाह इस तरह से अपने बन्दों के गुनाहों की बख्शिश फरमाता है और उन्हें अपना क़ुर्ब अता करता है।
✨फरमाने मुस्तफा ﷺ है:
मुसलमान को जो भी परेशानी, गम, रंज, तक़लीफ़ और दुःख पहुँचता है, यहां तक अगर उसे कोई काँटा भी चुभता है तो अल्लाह इस तक़लीफ़ की वजह से उसके गुनाह माफ फरमा देता है
📒बाहवाला:
◆सहीह बुखारी 5641,5642
◆सहीह मुस्लिम 6568
✅इस दुआ का अंदाज इतना खूबसूरत है कि एक बन्दा बहुत कम अल्फ़ाज़ में अपनी सारी तक़्लीफ़ों का जिक्र कर देता है और उसके बाद बस ये कह कर रह जाता है कि तू सबसे बढ़कर रहम करने वाला है।
◆कोई शिकवा शिकायत नहीं, कोई मुतालबा नहीं।
◆दुआ के इस तरीके में कुछ ऐसी शान नजर आती है कि जैसे कोई इन्तहाई शरीफ, खुद्दार और सब्र करने वाला शख्स कई दिनों के फाक़ो से बेताब हो कर किसी निहायत करीम हस्ती के सामने बस इतना कह कर रह जाये कि मैं भूखा हूं और और आप फय्याज हैं।
यानी अल्लाह के अर्हमुर राहीमीन होने का वास्ता दे कर बन्दे ने उसकी हमेशा क़ायम और रवां दवां रहमत का सवाल किया है, जिसके बदले वो करीम रब अपने बन्दों की तकलीफों को दूर करता है।
📌 दुआ – 47
✨ शैतान के वसवसों से बचने की दुआ::
﷽
🔸 رَّبِّ اَعُوۡذُ بِکَ مِنۡ ہَمَزٰتِ الشَّیٰطِیۡنِ ﴿ۙ۹۷﴾
وَ اَعُوۡذُ بِکَ رَبِّ اَنۡ یَّحۡضُرُوۡنِ ﴿۹۸﴾
🔹ऐ परवरदिगार! मैं शैतानों के वसवसों से तेरी पनाह माँगता हूँ। और ऐ मेरे परवरदिगार, मैं तो इससे भी तेरी पनाह माँगता हूँ कि वो मेरे करीब आयें।
📖 सूरह अल-मूमिनून 23:97-98
📃 अहम बातें:
◆अल्लाह ने अपने प्यारे नबी ﷺ को शैतान के वसवसों से बचने के लिए ये दुआ सिखाई।
◆इससे पिछली आयत (आयत नंबर 96) से सबक मिलता है कि हक़ की दावत देने वाले शख्स को बुरे लोगों की शरारतों को भी अहसन अंदाज में दरगुजर करना चाहिए।
और साथ ही ऐसे शख्स को ये दुआ हमेशा करते रहना चाहिए कि
✨”ऐ परवरदिगार! हक़ की दावत में अड़ंगा लगाने वाले इंसानो की शक्ल में शैतान हो या जिन नुमा शैतान, मुझे उनसे पनाह में रख। बल्कि इससे भी बढ़कर ऐसे इन्तेजाम फरमा कि वो मेरे करीब भी न आने पाये।”
✅इसी का अमली नमूना है कि रसूल-ए-रहमत ﷺ कसरत से ज़िक्र और अज़कार करते थे। और इसी की तालीम आप ﷺ ने उम्मत को फ़रमाई।
📌 सहीह अहादीस से साबित सुन्नत अज़कार की मजीद तफसील के किये ब्लॉग देखें:
★ https://wp.me/p9A0OZ-1Pj
📌 दुआ – 48
✨ ज़ालिम कौम के खिलाफ अल्लाह से मदद माँगने की दुआ::
﷽
🔸 اَنِّیۡ مَغۡلُوۡبٌ فَانۡتَصِرۡ ﴿۱۰﴾
🔹(ऐ परवरदिगार!) मैं मग़लूब हो चुका, अब तू इनसे इन्तिक़ाम ले।
📖 सूरह क़मर 54:10
📃 अहम बातें:
◆यह दुआ हजरत नूह अलै. की है, जो उन्होंने अपनी जालिम कौम के खिलाफ मांगी।
◆हजरत नूह अलै. ने 950 साल तक अपनी कौम को तौहीद की दावत दी, लेकिन उनकी कौम ने न सिर्फ उन्हें झुठलाया बल्कि उन्हें दीवाना कहा, परेशान किया और धमकियां दी।
◆कोई रसूल अलै. उस वक़्त तक अपनी क़ौम के खिलाफ बद्दुआ नहीं करता जब तक कि उसे क़ौम के ईमान लाने की ज़रा भी उम्मीद हो। जब दावत देते हुए एक लंबी मुद्दत गुजर जाए और क़ौम अपनी सरकशी की रविश पर बरकरार रहे तो फिर उस क़ौम पर अल्लाह का अज़ाब आना लाजिम हो जाता है; ऐसे हालात में रसूल अलै. अल्लाह से शिकवा करता है।
◆कई बार देखा जाता है कि हक़ की पैरवी करने वाले मगलूब (पीड़ित) रहते हैं और हक़ के इंकारियों का जमीन में जोर रहता है, लेकिन हकीकत में अल्लाह तआला काफिरों को ढ़ील दे रहा होता है, और उनकी मुद्दत पूरी होने पर अल्लाह उन्हें अपने अज़ाब में पकड़ लेता है, जिस तरह अल्लाह तआला ने सैलाब का अज़ाब भेज कर हजरत नूह अलै. की क़ौम को हलाक कर दिया।
✅आज भी अल्लाह का यह कानून जारी है, उसने ऐसी कई जालिम कौमों और साम्राज्यों को तबाह किया है, जिनके खात्मे के बारे में कोई तस्सवुर भी नहीं कर सकता था। लेकिन एक लंबे अरसे तक चलने वाले इस अमल को एक ईमान वाला ही अल्लाह के अज़ाब के तौर पर समझ पाता है, बाकी अवाम के लिए यह महज एक ‘हादसा’ होता है।
📌 दुआ – 49
✨ हजरत यूनुस अलै. का इस्तिगफार::
﷽
🔸 لَّاۤ اِلٰہَ اِلَّاۤ اَنۡتَ سُبۡحٰنَکَ ٭ اِنِّیۡ کُنۡتُ مِنَ الظّٰلِمِیۡنَ ﴿۸۷﴾
🔹(ऐ ईलाही!) तेरे सिवा कोई माबूद नहीं, तू पाक़ है, बेशक मैं ही ज्यादती करने वालों में से था।
📖 सूरह अम्बिया 21:87
📃 अहम बातें:
🔹जब हज़रत यूनुस अलै. को मछली ने निगल लिया तो उस वक़्त मछली के पेट के अंधेरे में उन्होंने अपने रब से इन अल्फ़ाज़ में तौबा की।
✨अल्लाह ने उनकी तौबा क़ुबूल की और अल्लाह के हुक्म से मछली ने उन्हें किनारे पर छोड़ दिया।
📜वाकिया यह हुआ कि हजरत यूनुस अलै., अल्लाह का हुक्म आने से पहले ही अपनी बस्ती को छोड़ गए थे, अल्लाह तआला को उनकी यह बात सख़्त नागवार गुजरी। इस वजह से अल्लाह तआला ने उन्हें इस आजमाइश में डाला कि वह जिस कश्ती में सवार हुए थे, उससे उन्हें दरिया में फेंक दिया गया और एक मछली ने उन्हें निगल लिया जिसके पेट में वह (रिवायतों के मुताबिक़) 3 दिन रहे।
✨उनके इन अल्फ़ाज़ में तौबा करने के बाद ही अल्लाह तआला का जलाल कम हुआ, दरिया-ए-रहमत ने जोश मारा, और मछली ने आप अलै. को किनारे पर जिंदा उगल दिया।
📌इस किस्से में कई अक़ाइद की इस्लाह और हिकमत की बातें हैं, मसलन:
☝🏻अल्लाह बेनियाज़ है, अल्लाह का कानून सबके लिए बराबर है, इससे भी बढ़कर अल्लाह के नजदीक जिनके मर्तबे बुलन्द हैं, उनकी जिम्मेदारियां भी ज्यादा बड़ी है।
◆किसी क़ौम को छोड़कर हिजरत करने का हुक्म अल्लाह की तरफ से ही आता है, लेकिन यहां हज़रत यूनुस अलै. ने बिना अल्लाह के हुक्म के हिजरत की तो अल्लाह ने उन्हें इस आज़माइश में डाल दिया।
और अल्लाह का गुस्सा इतना सख्त था कि क़ुरआन में जिक्र आता है:
⚡अब अगर वो (यूनुस अलै.) तस्बीह करने वालों में से न होता,
तो क़ियामत के दिन तक उसी मछली के पेट में रहता।
📖 सूरह साफ्फात 37:143-144
✨साथ ही यह किस्सा हमें यह सबक भी देता है कि अल्लाह की रहमत उसके गज़ब से बढ़कर है।
📒 सहीह बुखारी 3194
✨जब हज़रत यूनुस अलै. ने अपने रब के अकेले इलाह होने और उसके गलती, ऐब और कोताहियों से पाक होने का हवाला दिया और इक़रार किया कि इंसान होने के नाते मैं तो गलती का पुतला ही हूँ, लेकिन तू गलती नहीं करता, तेरी हस्ती सरापा रहमत है, ऐ रब मुझे बख्श दे; तो इस पर अल्लाह ने उन्हें उस ग़म से निजात दे दी।
★क़ुरआन के अल्फ़ाज़ में:
🔸فَاسۡتَجَبۡنَا لَہٗ ۙ وَ نَجَّیۡنٰہُ مِنَ الۡغَمِّ ؕ وَ کَذٰلِکَ نُــۨۡجِي الۡمُؤۡمِنِیۡنَ ﴿۸۸﴾
🔹तब हमने उसकी दुआ क़बूल की और ग़म से उसको नजात दी, और इसी तरह हम ईमानवालों को निजात देते हैं।
📖 सूरह अम्बिया 21:88
✅यह बहुत अजीम दुआ है, जिसे हमें अपनी नमाजों और ज़िक्र-ओ-अज़कार में जरूर शामिल करना चाहिए।
✨इस दुआ के बारे में फरमान-ए-मुस्तफा ﷺ है:
🔹ज़ुन्नून (यूनुस अलै.) की दुआ जो उन्होंने मछली के पेट में रहने के दौरान की थी वह यह थी:
لا إله إلا أنت سبحانك إني كنت من الظالمين
📌 यह ऐसी दुआ है कि जब कोई मुसलमान शख्स इसे पढ़कर दुआ करेगा तो अल्लाह तआला उसकी दुआ जरूर क़ुबूल फरमाएगा।
📒 जामेअ तिर्मिज़ी 3505 – सहीह
📌 दुआ – 50
✨ बेहया क़ौम के खिलाफ अल्लाह से मदद की दुआ::
﷽
🔸رَبِّ انۡصُرۡنِیۡ عَلَی الۡقَوۡمِ الۡمُفۡسِدِیۡنَ ﴿۳۰﴾
🔹ऐ मेरे रब! इन बिगाड़ फैलाने वाले लोगों के मुक़ाबले में मेरी मदद कर।
📖 सूरह अन्कबूत 29:30
📃 अहम बातें:
🔹हज़रत लूत अलै. ने बेहया क़ौम के खिलाफ अल्लाह से इन अल्फ़ाज़ में मदद मांगी।
📌 दुआ – 51
✨ अपनी हर तक़लीफ़ में अल्लाह से दुआ::
﷽
🔸اِنَّمَاۤ اَشۡکُوۡا بَثِّیۡ وَ حُزۡنِیۡۤ اِلَی اللّٰہِ
🔹मैं अपनी परेशानी और गम का शिकवा सिर्फ अल्लाह से करता हूँ।
📖 सूरह यूसुफ 12:86
📃 अहम बातें:
🔹जब हजरत याक़ूब अलै अपने बेटे हजरत यूसुफ अलै. से जुदाई के गम में मुब्तिला हुए तो उन्होंने ये दुआ के अल्फ़ाज़ अदा किये।
🔹इस दुआ से हमें यह पैगाम मिलता है कि एक मोमिन को अपने हर गम का शिकवा अपने रब से करना चाहिए। वही अकेला मुश्किलकुशा और हाजत रवा है।
📌इसी की जिंदा मिसाल है कि अगर जूते का तस्मा(फीता) भी टूट जाए तो अल्लाह तआ़ला से माँगो, यह तौहीद हमारे प्यारे नबी ﷺ ने हमें सिखाई है: 👇
🔹रसूलल्लाह ﷺ ने फरमाया : ✨तुममें से हर शख़्स को अपनी तमाम जरूरतें अपने रब से माँगनी चाहिए यहाँ तक कि जब उसके जूते का फीता टूट जाए तो उसके बारे में भी उसी से सवाल करना चाहिए।
📒 मिश्कात-उल-मसाबीह #2251
🔹रसूलल्लाह ﷺ ने फरमाया:
✨तुम अल्लाह के अहकाम की हिफाज़त करो वह तुम्हारी हिफाज़त फरमाएगा, तुम अल्लाह के हुकूक़ का ख्याल रखो उसे तुम अपने सामने पाओगे, जब तुम कोई चीज़ मांगो तो सिर्फ़ अल्लाह से मांगो, जब तुम मदद चाहो तो सिर्फ़ अल्लाह से मदद तलब करो।
📒 सुनन तिर्मिज़ी #2516
📌 दुआ – 52
✨ इस्लाम की हालत में दुनिया से रुख्सत होने और आख़िरत में नेक लोगों का साथ चाहने की दुआ::
﷽
🔸اَنۡتَ وَلِیّٖ فِی الدُّنۡیَا وَ الۡاٰخِرَۃِ ۚ تَوَفَّنِیۡ مُسۡلِمًا وَّ اَلۡحِقۡنِیۡ بِالصّٰلِحِیۡنَ ﴿۱۰۱﴾
🔹ऐ ज़मीन और आसमान के बनाने वाले! तू ही दुनिया और आख़िरत में मेरा सरपरस्त है।
(ऐ मेरे परवरदिगार!) मुझे इस हालत में दुनिया से उठाना कि मैं तेरा फरमाबरदार (मुस्लिम) हूँ, और मुझे सालेह लोगों के साथ मिला दे।
📖 सूरह यूसुफ 12:101
📃 अहम बातें:
🔹यह दुआ हजरत यूसुफ अलै. ने उस वक्त की जब आप हजरत याकूब अलै. और अपने बाकी खानदान से मिस्र में मिले।
✨ये कुछ जुमले जो इस मौके पर हज़रत यूसुफ़ अलै. की ज़ुबान से निकले हैं, हमारे सामने एक सच्चे ईमानवाले की सीरत और किरदार का अजीब दिलकश नक़शा पेश करते हैं।
★रेगिस्तानी चरवाहों के ख़ानदान का एक आदमी, जिसको ख़ुद उसके भाइयों ने हसद और जलन के मारे मार डालना चाहा था, ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव देखता हुआ आख़िरकार दुनियावी तरक़्क़ी के सबसे बुलंद मक़ाम पर पहुँच गया है। क़हत और सूखे के शिकार उसके ख़ानदान वाले अब उसके मुहताज होकर उसके सामने आए हैं और हसद रखनेवाले उसके भाई भी, जो उसको मार डालना चाहते थे, उसके शाही तख़्त के सामने सिर झुकाए खड़े हैं ।
⚡यह मौक़ा दुनिया के आम दस्तूर के मुताबिक़ अपनी बड़ाई जताने, डींगे मारने, गिले और शिकवे करने, और बुरा-भला कहने और तानों के तीर बरसाने का था। मगर एक सच्चा ख़ुदापरस्त इंसान इस मौक़े पर कुछ दूसरे ही अख़लाक़ को ज़ाहिर करता है।
✨वह अपनी इस तरक़्क़ी पर घमंड करने के बजाए उस ख़ुदा के एहसान को तस्लीम करता है जिसने उसे यह रुतबा दिया। वह ख़ानदान वालों को उस जुल्म-सितम पर कुछ भी बुरा-भला नहीं कहता जो शुरू की उम्र में उन्होंने उस पर किए थे। इसके बरखिलाफ़ वह इस बात पर शुक्र अदा करता कि ख़ुदा ने इतने दिनों की जुदाई के बाद उन लोगों को मुझसे मिलाया। वह हसद रखने वाले भाइयों के ख़िलाफ़ शिकायत का एक लफ़्ज़ ज़बान से नहीं निकालता। यहाँ तक कि यह भी नहीं कहता कि उन्होंने मेरे साथ बुराई की थी, बल्कि उनकी सफ़ाई ख़ुद ही इस तरह पेश करता है कि शैतान ने मेरे और उनके दरमियान बुराई डाल दी थी। और फिर उस बुराई के भी बुरे पहलू को छोड़कर उसका यह अच्छा पहलू पेश करता है कि ख़ुदा जिस मक़ाम पर मुझे पहुंचाना चाहता था उसके लिए यह अल्लाह की हिकमत के मुताबिक़ मेरे लिए भलाई थी।
✨कुछ अलफ़ाज़ में यह सब कुछ कह जाने के बाद वह बेइख़्तियार अपने ख़ुदा के आगे झुक जाता है, उसका शुक्र अदा करता है कि तूने मुझे बादशाही दी और वे क़ाबिलियतें दीं जिनकी बदौलत मैं जेल में सड़ने के बजाए आज दुनिया की सबसे बड़ी सल्तनत पर हुकूमत कर रहा हूँ।
✨और जब अल्लाह का यह सच्चा बन्दा आखिर में ख़ुदा से कुछ माँगता है तो यह कि:
🤲🏻 “दुनिया में जब तक ज़िन्दा रहूँ तेरी बन्दगी और गुलामी पर जमा रहूँ और जब इस दुनिया से जाऊँ तो मुझे नेक बन्दों के साथ मिला दिया जाए।”
✨ कितना बुलन्द और कितना पाकीज़ा है यह सीरत और किरदार का नमूना !
📃 तफ़हीमुल क़ुरआन सूरह यूसुफ हाशिया 71
📌यह किस्सा और यह आयत हमें सबक देती है कि एक मुसलमान बन्दे को हमेशा मुकम्मल ईमान की हालत और नेक आमाल करते हुए मौत की दुआ करनी चाहिये।
💠इस बारे में इरशादे नबवी ﷺ है कि:
✨एक बंदा लोगों की नजर में अहले जन्नत(जन्नतियों) के अमल करता रहता है हालांकि वह अहले जहन्नुम में से होता है [यानी अपने आखिरी वक्त में वो ऐसे गुनाहों में लग जाता है कि वो जहन्नुम में पहुँच जाता है, इसके उलट]
और एक दूसरा बंदा लोगों की नजर में अहले जहन्नुम(जहन्नमियों) के काम करता है हालांकि वह अहले जन्नत में से होता है और आमाल का दारोमदार तो खात्मे पर है।
📒 सहीह बुखारी 6493
🔹फरमाबरदारी की हालत (यानी इस्लाम) में अपनी जिंदगी गुजारने और कामिल ईमान की हालत में वफात चाहने के लिए प्यारे रसूल ﷺ की ये सुन्नत दुआ हमें अहादीस की किताबों में मिलती है जो आप नमाजे जनाजा में पढ़ते थे:
💠 …اللَّهُمَّ مَنْ أَحْيَيْتَهُ مِنَّا فَأَحْيِهِ عَلَى الْإِسْلَامِ، وَمَنْ تَوَفَّيْتَهُ مِنَّا فَتَوَفَّهُ عَلَى الْإِيمَانِ
✨ ऐ अल्लाह! तू हम में से जिसे जिंदा रखे, उसे इस्लाम पर जिंदा रख।
और तू जिसे वफात दे, उसे क़ामिल ईमान पर वफात अता कर।
📒 सुनन इब्ने माज़ा 1498
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